श्री कृष्णाय नमः
(१)
shrimad Bhagwat mahapuran dasham skandh
कस्तूरी तिलकं ललाट पटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकं कर तले, वेणु करे कंकणम।।
सर्वांग हरिचंदनम सुललितम कंठे च मुक्तावलीम।
गोपस्त्री परिवेश्तिथौ विजयते गोपाल चूड़ामणि।।१।।
सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः।।२।।
यदुनंदनन्दन देवकी वासुदेव नंदन वंदनम।
मृदु चपल नयनम चंचलम मनमोहन अभिनंदनम।।३।।
हे दीनबंधु दिनेश सर्वेश्वर नमोस्तुते।
गोपेश गोपी का कांत राधाकांत नमोस्तुते।।४।।
धन्य वृंदावन धाम है धन्य वृंदावन नाम।
धन्य वंदावन रसीक जो सुमरे श्यामा श्याम।।५।।
प्रेम मयी श्री राधिका, प्रेम सिंधु गोपाल।
प्रेम भूमि वृंदाविपिन, प्रेम रुफ बब्रज बाल।।६।।
सहज रसीली नागरी सहज रसीलो लाल।
सहज प्रेमी की बेलि मनो लपटी प्रेम तमाल।।७।।
माता मेरी श्री राधिका पिता मेरे घनश्याम।
इन दोनों के चरणों में प्रणवौ बारंबार।।८।।
राधा राधा रटत ही भव व्याधा मिट जाए।
कोटी जन्म की आपदा राधा नाम लियो सो जाए।।९।।
राधा मेरी स्वामिनी मैं राधे को दास।
जन्म-जन्म मोहे दीजियो वृंदावन के बास।।१०।।
श्री राधे बृषभानुजा भक्तनि प्राणाधार।
वृंदावन विपिन विहारिणी प्रणवौ बारंबारम।।११।।
जय जय श्री राधा रमण जय जय नवल किशोर।
जय जय गोपी चितचोर प्रभु जय जय माखन चोर।।१२।।
श्री राधे हाथ मेंहन्दी लगी, नथमे उलझे केश।
नंदनंदन सुलझावते, धरी ललिता का वेश।।१३।।
जसोदा जी को लाडलो संतन को प्रतिपाल।
गहे शरण प्रभु राखियो, सभ अपराध बिसार।।१४।।
कथा प्रारंभ होत है सुनो वीर हनुमान।
आसन अपनो लीजिए पवनसुत बलवान।।१५।।
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम, श्री राम राम भरताग्रज राम राम।
श्री राम राम रणकर्कश राम राम, श्री राम राम शरणम् भव राम राम।।१६।।
राम रामेति रमे रामे, सहस्त्रनाम तत्तुल्य राम नाम वरानने।।१७।।
राजा परीक्षित द्वारा कलयुग का दमन और परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का श्राप-:
द्वापर युग के अंतिम चरण में जब पांडव अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को भूमंडल का अधिपति बनाकर स्वयं स्वर्गारोहण की यात्रा पर चले जाते हैं। इधर परीक्षित अपने पूर्वजों की कीर्ति के अनुकूल संपूर्ण भूमंडल पर शासन करने लगे, उनके राज्य में सर्वत्र सुख शांति वैभव की सरिता निरंतर बह रही थी। एक दिन राजा परीक्षित ने अपने राजकोष के भवनों का निरीक्षण किया। उसी समय एक भवन में उन्होंने देखा, कि एक बहुत बड़ा देदीप्यमान मणि माणिक्य से जड़ा हुआ एक सुंदर मुकुट रखा हुआ था। उस मुकुट की शोभा को देखकर के राजा बहुत ही प्रसन्न हुए। उस मुकुट को अपने मस्तक पर धारण कर अपनी कुछ सैनिक टुकड़ियों के साथ अश्व पर आरूढ़ होकर वन में आखेट खेलने के लिए चले जाते हैं। उसी समय उन्होंने वन में एक आश्चर्यजनक घटना देखी, उन्होंने देखा कि एक काले वर्ण का चांडाल पुरुष एक गौ माता व उसके बछड़े को चाबुक से बुरी तरह से मार रहा था।गौमाता आंखों से अश्रु धारा बहाती हुई , आगे आगे दौड़ रही थी और वह चांडाल गौ माता के पीछे दौड़ रहा था। तब राजा परीक्षित ने ऐसी घटना देखी, राजा परीक्षित ने अपने धनुष पर बाण चढाकर क्रोध से उस चांडाल पुरुष को सावधान करते हुए बोले हे चांडाल पुरुष! सावधान मैं तुम्हें अभी यमलोक की यात्रा कर आता हूं। क्योंकि शायद तुम नहीं जानते हो यह राजा परीक्षित का शासन है और उनके रहते हुए तुम इस प्रकार गौ माता पर अत्याचार नहीं कर सकते हो, वह पुरुष कांपने लगा और विलाप करता हुआ परीक्षित जी के चरणों में गिर गया और कहने लगा भगवान मुझे क्षमा करना, मुझे ब्रह्मदेव ने भेजा है मेरा नाम कलयुग है और अब मेरा समय आ गया है भगवन मै क्या करूं क्योंकि ब्रह्मा जी ने मेरा स्वभाव ऐसा ही बनाया है। अधर्म में मेरी सहज रुचि है पाप कर्म में मेरा मन अधिक लगता है। तब राजा परीक्षित ने कहा कि तुम्हारे अंदर बुरे कर्मों के साथ-साथ कोई अच्छा कर्म भी है तब कलयुग बोला भगवान मेरे अंदर 100 में से 99 बुराइयां है और एक अच्छाई है और वह एक अच्छाई ऐसी है जो अब तक किसी भी काल में नहीं थी तब परीक्षित ने पूछा कलयुग बताओ वह कौन सी अच्छाई है जो अब तक किसी भी काल में नहीं थी, तब कलयुग बोला कि जो मनुष्य उठते बैठते कभी भी प्रभु का स्मरण करेगा , इस नाम स्मरण मात्र से ही वह इस भवसागर से पार हो कर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है जब राजा परीक्षित ने कलयुग के अंदर नाम स्मरन की इतनी बड़ी
विशेषता को जाना तो कलयुग के प्राणियों के कल्याण के लिए कलयुग का प्राणांत नहीं किया, और कहने लगे हे कलयुग तुम्हारी इसी एक अच्छाई के कारण में तुम्हें प्राण दान देता हूं लेकिन ध्यान रहे जब तक मेरा शासन रहेगा तब तक तुम नहीं आ सकते हो मेरे शासन के बाद ही तुम्हारा प्रवेश हो सकता है। तब कलियुग हाथ जोड़कर के राजा परीक्षित की बात को स्वीकार करता हैं, और कहने लगा कि भगवन जब तक आप का शासन है तब तक मुझे रहने के लिए कोई उचित स्थान दीजिए जहां में निवास कर आप के शासन के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर सकूं। तब राजा परीक्षित ने कहा देखो कलयुग तुम अपवित्रता , मद्यपान ध्दुय क्रीड़ा में तुम्हारा निवास होगा, तब कलयुग कहने लगा भगवान आपने मेरे लिए जितने भी स्थान बताएं हैं वे सारे के सारे अपवित्र हैं कृपा करके कोई एक अच्छा सा स्थान और बता दीजिए तब परीक्षित ने कहा कि हे कलयुग तुम पाप कर्म से प्राप्त स्वर्ण में भी तुम्हारा निवास हो सकेगा, तब राजा परीक्षित ने कलयुग को रहने की लिए ये स्थान बताएं तत्काल कलयुग अपना शरीर छोड़ कर के अदृश्य होकर के राजा परीक्षित का जो स्वर्ण का मुकुट था उसमें बैठ जाता है। और उधर राजा परीक्षित ने गौ माता और गोवत्स साक्षात धर्म को आश्वस्त किया की हे पृथ्वी देवी मां और हे साक्षात भगवान धर्म मैं आश्वस्त करता हूं कि मेरे शासक के रहते हुए किसी भी प्रकार से तुम्हें कोई नहीं सता सकता है। ऐसा कह कर राजा परीक्षित ने गोवत्स जो साक्षात धर्म है उसके जो तीन पैर चांडाल ने तोड़ दिए थे दया धर्म पवित्रता और सत्य इनको
जोड़ दिए , ऐसा आश्वासन देकर पृथ्वी देवी स्वरूपा गौमाता और धर्म स्वरूप गोवत्स राजा परीक्षित को शुभ आशीष दे कर वहां से चले जाते हैं।।
जब राजा आखेट खेलने के लिए आगे गये, मार्ग में राजा को प्यास लगती , राजा का गला सूख जाता है जब चारों तरफ नजर फैलाकर के राजा परीक्षित ने देखा कि कहीं पानी का स्रोत हो लेकिन कहीं पर भी जब पानी का स्रोत दिखाई नहीं दिया, अंत में परीक्षित ने देखा कि पास में किसी मुनि का आश्रम है वही जा कर मुझे जलपान करना चाहिए राजा पानी की प्यास बुझाने के लिए मुनि के आश्रम पर पहुंच जाता है। वहां जाकर देखा कि लोमस मुनि आंखें मूंदे हुए ईश
वंदना कर रहे हैं। राजा परीक्षित ने जोर से आवाज लगाई, हे मूनि मुझे प्यास लग रही है और मैं राजा परीक्षित आपसे जल की याचना करता हूं, जब राजा ने बार-बार ऐसा निवेदन किया लेकिन लोमस मुनि अपनी ध्यान में मग्न थे उन्हें पता ही नहीं था कि कोई उन्हें आवाज दे रहा है जब मुनि का ध्यान भंग नहीं हुआ, राजा परीक्षित को क्रोध आ गया और उसने सोचा कि यह पाखंडी मुनि मुझे देख करके आंखें बंद करके ईश्वर ध्यान का ढोंग कर रहा है ऐसा विचार करके राजा परीक्षित ने वहां पर एक काला मरा हुआ सर्प पड़ा हुआ था उसे अपने बाण से उठाया और लोमस ऋषि के गले में डाल दिया और वहां से राजा परीक्षित लौट कर के अपनी राजधानी आ जाते हैं।। जब राजा परीक्षित अपने भवन में आकर के मुकुट उतारा राजा को ज्ञान हुआ तो सोच कर कहने लगा कि कंचन में एक कलयुग का वास है यह मेरे शीश पर था इसी से मेरी ऐसी कुमति हुई जो मरा सर्प मुनि के गले में डाल दिया।सो मैं अब समझा कि कलयुग ने मुझे से अपना पलटा लिया है। इस पाप से मैं कैसे मुक्त हो हूंगा, मैंने ब्राह्मण को सताया है। राजा परीक्षित इस प्रकार सोच के सागर में डूबे रहे थे। और जहां लोमस ऋषि थे वहां कुछ एक लड़के खेलते हुए, आऐ उन्होंने लोमश ऋषि के गले मेंं मरा हुआ सर्प देखा तो अचंभित रह गए। उनमें से किसी ने कहा की इनकेे पुत्र श्रृंगी को जा कर के बताना चाहिए जो इस समय ऋषि कुमारों केे साथ खेल रहा है जब ऋषि कुमारों ने लोमस ऋषि के पुत्र श्रृंगी को सारा वृतांत बताया ऋषि कुमार श्रृंगी की आंखें लाल लाल हो गई हॉट फड़फड़ानेे लगी क्रोध करके ऋषि कुमार श्रृंगी नेेे अपने हाथ में जल लिया और श्राप दियाा कि जिसने भी मेरे पिताजी के गलेे में मरा हुआ नाग डालाा है वहीं नाग आज सेेेे सातवें दिन उसे डसेगा।
इस प्रकार श्रृंगी राजा को श्राप देखकर अपने पिता के पास जा कर गले से साप निकाल कर कहने लगा हे पिताजी तुम अपनी देह संभालो मैंने उसे साप दिया है जिसने आपके गले में मरा नाग डाला था, यह सुनते ही लोमस ऋषि ने ध्यान हटा करके अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि पुत्र श्रृंगी ने राजा परीक्षित को श्राप दे दिया, लोमस ऋषि अपने पुत्र श्रृंगी से कहने लगे अरे पुत्र तूने यह क्या किया क्यों राजा को श्राप दिया उसके राज्य में हम सुखी थे पशु-पक्षी भी दुखी नहीं थे ऐसा धर्म राज्य था कि जिसमें सिंह गाय एक साथ रहते हैं। उसे श्राप
क्यों दिया तनिक दोष पर इतना बड़ा श्राफ तूने दे दिया। तूने बहुत बड़ा पाप किया है। कुछ विचार मन में नहीं किया गुण छोड़ अवगुण ऊपर तुमने विचार किया साधु को चाहिए शील स्वभाव से रहे आप कुछ ना कहे औरों की सुनले। तब लोमस ऋषि ने एक शिष्य को बुलाकर कहा तुम राजा परीक्षित को जाकर सचेत कर दो कि तुम्हें श्रृंगी ऋषि ने शाप दिया है जिससे राजा कुछ सचेत हो जाए गुरु की आज्ञा पाकर शिष्य राजा परीक्षित के भवन में गया। वहां जाकर देखा राजा परीक्षित शोक मग्न हो रहे हैं और अपार सोच सागर में डूब रहे थे तब शिष्य ने राजा परीक्षित से कहा कि भगवन तुम्हें श्रृंगी ऋषि ने यह श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन काला नाग तक्षक तुम्हें डसेगा। सुनते ही राजा प्रसन्नता से खड़ा हो हाथ जोड़ कहने लगा कि मुनि ने मुझ पर बड़ी कृपा की जो श्राप दिया क्योंकि माया मोह के अपार सुख सागर में पढ़ा था तो निकाल बाहर किया। जब मुनि का शिष्य विदा हुआ, तब राजा ने वैराग्य धारण किया और अपने पुत्र जनमेजय को बुलाया राज्य पाट देखकर कहा बेटा गो ब्राह्मण की रक्षा करना और प्रजा को सुख प्रदान करना, राजा को वैराग्य लिए हुए जानकर
रानी सब उदास होकर राजा के पांव पर गिर रो रो कर कहने लगी, महाराज हम भी तुम्हारे साथ ही चलेंगे , राजा बोला सुनो स्त्री को उचित है उससे अपने पति का धर्म रहे सो करें उत्तम कार्य में बाधा ना डालें इतना कहकर राजा परीक्षित
धन कुटुंब और राज्य की माया को छोड़कर निर्मोही होकर योग साधना के लिए गंगा के तट पर जा बैठे,।।
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाते हुए
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाते हुए
गंगा के तट पर सुखदेव मुनि का आना और राजा परीक्षित को धर्म उपदेश करना-:
इसको जिसने सुना वह हाय हाय कर बिना रोए नहीं रहा और यह समाचार जब मुनियों ने सुना कि राजा परीक्षित श्रृंगी ऋषि के शाप से मरने को गंगा तीर पर आ बैठा है। तब व्यास वशिष्ठ भरद्वाज कात्यायन पाराशर नारद विश्वामित्र वामदेव जमदग्नि आदि 88000 ऋषि आए और आसन बिछाए पंक्ति बना करके बैठ गए। अपने-अपने शास्त्र विचार अनेक अनेक प्रकार के धर्म राजा को सुनाने लगे, कि इतने में राजा की श्रद्धा देख पौथी कांख में लिए दिगंबर वेश श्री सुखदेव जी भी वहां पर आन पहुंचे, उनको देखते ही जितने मुनि थे सब उठ खड़े हुए और राजा परीक्षित भी हाथ बांध खड़ा हो विनती कर कहने लगा कृपा निधान मुझ पर बड़ी दया की जो इस समय आप ने मेरी सुध ली इतनी बात कही तब सुखदेव मुनि भी बैठे, राजा परीक्षित ऋषियों से कहने लगा कि सुखदेव जी व्यास जी के बेटे और पारस जी के पोते है, फिर भी उनको देख तुम बड़े बड़े मुनीश उठे सो तो उचित नहीं इसका कारण कहो, जो मेरे मन का संदेश जाए, तब पाराशर मुनि बोले राजा जितने हम बड़े-बड़े ऋषि हैं पर ज्ञान में सुखदेव से छोटे हैं इसलिए सबने सुखदेव जी का आदर मान किया है इन्होंने जब से जन्म लिया तब से ही उदासी हो वनवास करते हैं और राजा तेरा भी कोई बड़ा पुण्य उदय हुआ जो सुखदेव जी आए हैं अब सुखदेव मुनि ही हम से उत्तम धर्म कहेंगे, जिससे तू जन्म मरण से छूट भवसागर पार होगा यह वचन सुन राजा परीक्षित ने श्री सुखदेव जी को दंडवत करके पूछा महाराज मुझे धर्म समझाए के कहो किस रीती से कर्म के फंदे से छूट लूंगा सात दिन में क्या करूंगा, अधर्म है अपार कैसे भवसागर से मुक्ति होगी। तब सुखदेव मुनि बोले राजाा तू थोड़े दिन मत समझ मुक्ति तो एक घड़ी में ही हो जाती है जैसे हैं राजा कटवाने नारद मुनि से उपदेश पाकर के मुक्ति प्राप्त की थी। फिर तुझे तो 7 दिन मिले हैं एक चित्त होकर ध्यान धरो तो सब समझोगे।तब राजा परीक्षित ने हाथ जोड़कर के सुखदेव मुनि से पूछा भगवन सभी धर्मों में सबसे बड़ा धर्म कौन सा है कृपा करके आप मुझे बताइए, तब सुखदेव जी बोले राजा जैसे सब धर्मों में वैष्णव धर्म बड़ा है वैसे ही पुराणों में श्रीमद्भागवत सबसे हुए उत्तम है जब हरि भक्त यह कथा सुनाते है तब सब तीरथ और धर्म आ जाते हैं इस प्रकार भागवत पुराण के समान कोई दूसरा पुराण नहीं है इस कारण मैं तुझे 12 स्कंद वाला महापुराण सुनाता हूं जो व्यास मुनि ने मुझे पढ़ाया है तू आनंद से ध्यान लगा करके सुन, तब तो राजा परीक्षित प्रेम से सुनने लगे और सुखदेव जी प्रेम से सुनाने लगे कथा के श्रोता आने लगे।
जब सुखदेव मुनि ने राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत महापुराण के नो स्कंद की कथा सुनाई, तब परीक्षित ने हाथ जोड़कर के सुखदेव मुनि से निवेदन किया कि हे दीनदयाल अब आप कृपा करके मुझे दया के सागर श्री कृष्ण अवतार की कथा का वर्णन कीजिए, क्योंकि हमारे सहायक कुल पूज्य वही है सुखदेव जी बोले राजा तुमने मुझसे बड़ा ही सुंदर प्रसन्न किया है सुनो मैं प्रसन्न हो कर तुम्हें भगवान श्री कृष्ण की कथा का वर्णन सुनाता हूं सुखदेव मुनि कहने लगे यदुकुल में पहले भजमान नामक राजा थे जिनके पुत्र पृथु, पृथु के पुत्र विदुरथ विदुरथ के शूरसेन जिन्होंने नौखंड पृथ्वी जीतकर यश प्राप्त किया, उनकी स्त्री का नाम मरिष्या उसके दश लड़के और पांच लड़कियां थी जिनमें बड़े पुत्र वसुदेव और उनकी स्त्री के आठवें गर्भ से श्री कृष्ण चंद्र जी ने जन्म लिया। वसुदेव जी जन्मे थे तब देवताओं ने स्वर्ग में आनंद के वाजे बजाए थे और शूरसेन की पुत्रियों में सबसे बड़ी कुंती थी जो पांडवों को ब्याही थी जिसकी कथा महाभारत में गाई गई है, और वसुदेव जी पहले तो रोहन नरेश की बेटी रोहिणी को विवाह कर लाए थे जिसके पीछे सतरह विवाह किए, अट्ठारह वी पटरानी के रूप में मथुरा नरेश कंस की बहन व उग्रसेन के भाई देवकी पुत्री देवकी को ब्याह कर ला रहे थे तभी आकाशवाणी हुई कि इस लड़की के आठवें गर्भ से कंस का काल का जन्म होगा। यह सुनकर कंस बहन बहनोंई को एक घर में मूंद दिया, और श्री कृष्ण ने वहां ही जन्म लिया, इतनी कथा सुनते ही राजा परीक्षित बोले महाराज कैसे जन्म कंस ने लिया किसने उससे महावर दिया और किस रीती से कृष्ण का जन्म हुआ और फिर किस विधि से गोकुल पहुंचे यह सब मुझे विस्तार से सुनाइए।।
शुुकदेव मुनि ने जब इस प्रकार यमुनार्जुन वृक्षों की मुक्ति की कथा राजा परीक्षित को सुनाई, तो राजा परीक्षित हाथ जोड़कर के कहने लगे, भगवान अब आप कृपा करके मुझे बताइए कि यह जो यमुनार्जून अशोक के वृक्ष थे उनको दिव्य रूप किस कारण से प्राप्त हुआ? उन्होंने ऐसा कौन सा सद्कर्म किया था जो दिव्य रूप धारण करके श्री धाम की यात्रा की।जब राजा परीक्षित ने इस प्रकार का प्र्र्श्र्र्शन शुुकदेव मुनि से किया तो शुुकदेव मुनि प्रसन्न होकर कहने लगे, सुनो राजन पूर्व काल में ये दोनों अशोक के वृक्ष कुबेर के दो पुत्र थे जिसमें एक का नाम था नल कुुबर व दूसरे का नाम था मणि ग्र्री्र्रीव यह दोनों ही भाई अपने पिता के वैभव पर बहुत मतवाले होकर घमंड में रहते थे। एक समय दोनों भाई यमुना में स्नान कर रहे थे उधर से देव ऋषि नारद का आगमन हुआ देव श्री नारद को आया हुआ देखकर के जमुना में स्नान करने वाले अन्य लोगों ने नारद जी को प्रणाम किया। लेकिन ये दोनों भाई प्रणाम करना तो दूर रहा उनको देखकर के मुंह बनाकर के हंसने लगे, क्योंकि इनको अपने पिता के वैभव पर बहुत घमंड था। जब देव ऋषि नारद ने उन दोनों का इस प्रकार का आचरण देखा तो देव ऋषि को क्रोध आया और उनके इस अभिमान को दूर करने के लिए उन्होंने उन दोनों भाइयों को श्राप दिया कि अरे अभिमानीीीयोो तुम्हें अपने पिता के वैभव पर बहुत अभिमान है जिसके चलते तुम सज्जन पुरुषों का आदर सत्कार भी भूल गए हो अतः मैं तुम्हें श्राप देता हूं तुम्हारी बुद्धि इस समय एक जड़ वृक्ष के समान है अतः जाओ तुम तत्काल प्रभाव से वृक्ष बन जाओ तब नारद ने उन दोनों को ऐसा श्राप दिया तो उनको बहुत पश्चाताप हुआ और वे दोनों नाादर जी के चरणों में गिरकर के प्रणाम करने लगे और क्षमा प्रार्थना करने लगे। तब नारद जी ने कहा देखो द्वापर युग में जब भगवान विष्णु गोकुल में कृष्ण के रूप में अवतार लेंगे, उस समय स्वयं प्रभु श्री कृष्ण तुम्हारा उद्धार करेंगे। ऐसा उपाय बता कर के देव ऋषि नारद वहां से चले जाते हैं। और वे दोनों यमुना के तट पर अशोक के वृक्ष बन गए। और आज उन दोनों कुबेर पुत्र नल कुुबर व मनी गिव दोनों का उद्धार भगवान श्री कृष्ण ने किया।।
।। जय श्री राधे कृष्णा।।
आचार्य श्री कोशल कुमार शास्त्री
9414657245
जब सुखदेव मुनि ने राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत महापुराण के नो स्कंद की कथा सुनाई, तब परीक्षित ने हाथ जोड़कर के सुखदेव मुनि से निवेदन किया कि हे दीनदयाल अब आप कृपा करके मुझे दया के सागर श्री कृष्ण अवतार की कथा का वर्णन कीजिए, क्योंकि हमारे सहायक कुल पूज्य वही है सुखदेव जी बोले राजा तुमने मुझसे बड़ा ही सुंदर प्रसन्न किया है सुनो मैं प्रसन्न हो कर तुम्हें भगवान श्री कृष्ण की कथा का वर्णन सुनाता हूं सुखदेव मुनि कहने लगे यदुकुल में पहले भजमान नामक राजा थे जिनके पुत्र पृथु, पृथु के पुत्र विदुरथ विदुरथ के शूरसेन जिन्होंने नौखंड पृथ्वी जीतकर यश प्राप्त किया, उनकी स्त्री का नाम मरिष्या उसके दश लड़के और पांच लड़कियां थी जिनमें बड़े पुत्र वसुदेव और उनकी स्त्री के आठवें गर्भ से श्री कृष्ण चंद्र जी ने जन्म लिया। वसुदेव जी जन्मे थे तब देवताओं ने स्वर्ग में आनंद के वाजे बजाए थे और शूरसेन की पुत्रियों में सबसे बड़ी कुंती थी जो पांडवों को ब्याही थी जिसकी कथा महाभारत में गाई गई है, और वसुदेव जी पहले तो रोहन नरेश की बेटी रोहिणी को विवाह कर लाए थे जिसके पीछे सतरह विवाह किए, अट्ठारह वी पटरानी के रूप में मथुरा नरेश कंस की बहन व उग्रसेन के भाई देवकी पुत्री देवकी को ब्याह कर ला रहे थे तभी आकाशवाणी हुई कि इस लड़की के आठवें गर्भ से कंस का काल का जन्म होगा। यह सुनकर कंस बहन बहनोंई को एक घर में मूंद दिया, और श्री कृष्ण ने वहां ही जन्म लिया, इतनी कथा सुनते ही राजा परीक्षित बोले महाराज कैसे जन्म कंस ने लिया किसने उससे महावर दिया और किस रीती से कृष्ण का जन्म हुआ और फिर किस विधि से गोकुल पहुंचे यह सब मुझे विस्तार से सुनाइए।।
कंस का जन्म -:
सुखदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे
हे राजा परीक्षित तुमने मुझसे पूछा है कि किस प्रकार से कंस का जन्म हुआ तो सुनो मथुरा पुरी में आहूत नाम के राजा थे जिनके दो पुत्र थे एक का नाम देवक और दूसरे का नाम उग्रसेन था और इस प्रकार उग्रसेन ही मथुरा के राजा थे जिसकी एक रानी थी और उसका नाम था पवन रेखा, पवन रेखा बहुत ही सुंदर और पतिव्रता रानी थी अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करती थी एक दिन सज धज करके सोलह सिंगार करके पति के आज्ञा से सखी सहेलियों के साथ रथ पर चढ़कर उद्धान में विहार करने के लिए गई हुई थी वहां घने घने वृक्षों में फूल फूले हुए सुगंध वाली मंद मंद ठंडी हवा बह रही थी कोकि कोयल मीठी-मीठी मनभावन बोली बोल रहे थे और एक और पर्वत के नीचे यमुना लहरें ले कर के बह रही थी। रानी पवन रेखा इतने सुंदर दृश्य को देख कर के रथ से उतर कर के चलने लगी, अचानक एक और अकेली भूल से जा निकली वहां द्रुमलिक नामक राक्षस भी सहयोग से आ पहुंचा वह इसके यौवन और रूप की छवि देख कर कामुक हो गया और मनी मन कहने लगा कि इससे मुझे भौग करना चाहिए इस प्रकार दुष्ट द्रुमलिक नामक राक्षस ने रानी पवन रेखा के साथ उसका शीलभंग किया और उसके साथ भोग किया तब रानी अति दुुखी हो करके पछताने लगी, बोली अरे अधर्मी पापी चांडाल तूने यह क्या किया जो मेरे सत्य को खो दिया धिक्कार है तेरे माता पिता और गुरु को जिसने तुझे ऐसी बुद्धि दी, तेरा जैसा पुत्र जन्म से तेरी मां बाज क्यों नहीं रही, अरे दुष्ट जो अकेली पाकर किसी नााीर का सत भंग करते हैं सो जन्म जन्म नर्क में पडते हैं द्रुमलिक बोला रानी तू श्र्रााप मत दे तुझे मैंने अपने धर्म का फल दिया तेरी कोख बंद देख मेरे मन में बड़ी चिंता थी सो आज से गर्भवती होगी, आज से 10 माह में तुम्हारे पुत्र होगा और अपने पराक्रम से नौ खंडोंं कोजीतेगा और जिसका वध करने के लिए स्वयं नारायण अवतार लेंगे,मेरा नाम प्रथम कालनेमि था तब विष्णु से युद्ध किया था अब जन्म ले आया तो द्रुमलिक नाम कहलाया, तुझको पुत्र दे चला तू अपने मन में किसी बात की चिंता मत कर इतनी बात कहकर द्रुमलिक चला गया, तब रानी को भी कुछ सोच समझकर मन में धीरज धारण किया।।
जैसी हो होतब्यता, तैसी उपजै बुद्धि।
होनहार हद वसै, बिसर जाय सब सुद्धि।।
इतने में सब सखी सहेली आ करके मिलती है रानी का श्रृंगार बिगड़ा देख एक सहेली बोली इतनी देर तुझे कहां लगी और यह क्या गति हुई पवन रेखा ने कहा सुनो सहेली इस वन में एक बंदर आया उसने मुझे अधिक सताया जिस के डर से मैं अब तक थरथर कांप रही हूं यह बात सुनकर सब की सब घबराई और रानी को उठाए रथ पर चढ़ाई घर आई, जब 10 महीने पूरे हुए तब रानी के एक पुत्र का जन्म हुआ जिसके जन्म के समय एक बड़ी आंधी चली धरती डोलने लगी अंधेरा ऐसा हुआ जो दिन की रात हो गई और तारे टूट टूट कर गिरने लगे बादल गरजने लगी बिजली कड़कने लगी ऐसे समय में माघ सुदी तेरस बृहपति वार को कंस ने जन्म लिया, तब राजा उग्रसेन प्रसन्न होकर सारे नगर में मंगल बधावा बंटवाते हैं ब्राह्मण पंडित ज्योतिष यो को बुलाकर दान दक्षिणा देते हैं राजा ने बड़ी भाव भक्ति से ब्राह्मणों को आसन दे करके बिठाया तब ज्योतिषियों ने लग्न साध मुहूर्त विचार कर कहा हे पृथ्वीनाथ यह लड़का कंस नाम तुम्हारे वंश में उपजा है अति बलवान होगा राक्षसों को लेकर राज्य करेगा और देवताओं और हरि के भक्तों को दुख देगा आपका राजे लेकर स्वयं राज्य करेगा और भगवान के हाथों इसकी मृत्यु होगी।।
इस प्रकार सुखदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे कि हे राजन! मथुरा नरेश उग्रसेन के 10 पुत्र हुए, जिसमें सबसे बड़े पुत्र का नाम कंस था और जब से कंस धीरे-धीरे बड़ा होने लगा तो वह बचपन से ही बड़ा ही क्रूर स्वभाव का था वह जैसे-जैसे बड़ा होता जा रहा था बालकों को पकड़ पकड़ कर के पहाड़ियों की चोटी से फेंकने लगा और जो बराबर के बालक थे उनको वह किसी सूखे कुएं में डाल करके उनका प्राण अंत करने लगा, गाय और हरी भक्त साधु-संतों को सताने लगा, वह चांडाल स्वभाव का था उसके कर्मों को देखकर सभी मथुरा वासी त्राहि-त्राहि करने लगे, राजा उग्रसेन को गालियां देने लगे कि यह निश्चित रूप से महाराज उग्रसेन का पुत्र नहीं है यह तो कोई किसी राक्षस का पुत्र है इस प्रकार सभी राजा उग्रसेन के पुत्र कंस के हत्याचारों से सारी जनता त्राहि-त्राहि करने लगी, इस प्रकार जब कंस का हत्याचार दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था, मां पृथ्वी गौ का रूप धारण करके ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी के पास जाती है और ब्रह्मदेव को अपनी सारी दुख की कथा सुनाती है तब ब्रह्मदेव समस्त देवी देवताओं के साथ गौरुपणी पृथ्वी को लेकर वैकुंठ लोक विष्णु धाम पहुंचते हैं।।
सभीदेवता ब्रह्मदेव को आगे करके भगवान विष्णु की सुंदर स्तुति गाते हैं तब भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कहने लगे हे ब्रह्मदेव मैं तुम्हारे मनोरथ को जान चुका हूं अब आप निश्चिंत हो जाइए क्योंकि पृथ्वी देवी का भार दूर करने के लिए मैं स्वयं मथुरा नगरी में जन्म लूंगा और तुम सब देवी देवता ब्रजमंडल में जाकर के जन्म लो, और मैं वसुदेव के घर देवकी की कोख से जन्म लेकर के बाल लीला कर नंद यशोदा को सुख दूंगा, इस रीति से सुर मुनि गंधर्व सब अपनी अपनी स्त्रियों सहित जन्म ले ले ब्रज मंडल में आये, यदुवंशी और गोप कहलाए, और जो चारों वेदों की ऋचाएं सो भी ब्रह्मा की आज्ञा से गोपी हो ब्रज में आई और गोपी कहलाई, जब सब देवता मथुरा पुरी में आ चुके, तब क्षीरसमुद्र में हरी विचार करने लगे कि पहले लक्ष्मण होवे,।।
देवकी वासुदेव जी का विवाह और आकाशवाणी का होना-:
इस प्रकार सुखदेव मुनि राजा परीक्षित को गंगा के तट पर श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए कहने लगे हे राजा परीक्षित जैसा कि मैंने तुम्हें पहले बताया था कि महाराज उग्रसेन के छोटे भाई का नाम देवक था और उसकी पुत्री का नाम था देवकी ही जब देवक की पुत्री देवकी विवाह योग्य हुई तब उसने कंस के कहने पर अपनी पुत्री का विवाह शूरसेन के पुत्र वसुदेव के साथ तय किया और शुभ लग्न में टीका भेज दिया गया, तब शूरसेन भी बड़ी धूमधाम से बारात बनाकर सब देश-विदेश के नरेश साथ में लेकर के मथुरा पुरी में वसुदेव को ब्याने के लिए आते हैं। जब बारात नगर के निकट आई तो उग्रसेन देवक और कंस अपना दल साथ लेकर नगर के बाहर अगवानी करने के लिए आते हैं। फिर बारात
को जनवासा में ठहराया जाता है भोजन खिलाया जाता है सब बारातियों के मांडे के नीचे ले जाकर बैठाया गया और बेद की विधि से कंस ने वसुदेव को कन्यादान दिया जिसमें 15000 घोड़े 4000 हाथी अट्ठारह सो रथ और बहुत सारे दास दासी तथा बहुत सारा धन दिया। जब बारात विदा होने लगी कंस अपनी बहन देवकी से बहुत स्नेह करता था आज अपनी बहन को डोली में बिठाकर के बहन बहनोई को रथ में बिठाया और स्वयं सारथी बनकर के रथ हांकने लगा जैसे ही कंस देवकी और वासुदेव का रथ को आगे बढ़ाने लगा, उसी समय मार्ग में आकाश से जोर से आकाशवाणी होती है। हे कंस आज तुम देवकी को जिस प्रसन्नता से विदा करने जा रहे हो उसके गर्भ से जो आठवीं संतान होगी वह तेरा काल होगी।काल होगी यह सुनते ही कंस डरकर कांप उठा और क्रोध कर देवकी की चोटी पकड़ कर रख से नीचे खींच लाया, हाथ में तलवार लेकर के दांत पीस पीस कर कहने लगा जिस पेड़ को में जड़ से उखाड़ दूंगा उसके फल फूल कहां से लगेगा, अब इसी को मार दूंगा ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी, जब कंस अपनी बहन देवकी को मारने लगा,।
जो बैरी खैचे तलवार, करे साधु तिस की मनुहार। समुझ मूड सोई पछिताय, जैसे पानी आग बुझाय।।
तब वासुदेव कंस के चरणों में गिर गए और कहने लगे हे युवराज तुम यह क्या कर रहे हो तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि तुम बहुत बड़ा पाप करने जा रहे हो एक तो देवकी तुम्हारी बहन है दूसरी यह नवविवाहिता है तीसरी यह अबला है इस प्रकार तुम्हें इसके ऊपर इतना अत्याचार नहीं करना चाहिए, हां मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं ध्यान से सुनो, जैसा कि आकाशवाणी ने कहा है कि देवकी की आठवीं संतान तुम्हारा कॉल होगी तो मैं तुम्हें वचन देता हूं देवकी के गर्भ से जो भी संतान होगी मैं तुम्हें ला करके स्वयं अपने हाथों से दे दूंगा, वसुदेव जी ने ऐसा कहा तो कंस बड़ा प्रसन्न हुआ क्योंकि कंस जानता था कि वसुदेव जी कभी भी झूठ नहीं बोलते हैं अतः वह प्रसन्न होकर के हाथ जोड़कर वसुदेव जी से कहने लगा, हे वसुदेव! आज तुमने मुझे बचा लिया आज मेरे हाथ से बहुत बड़ा पाप हो जाता, तुम कितने महान हो ऐसा कह कर अपनी बहन देवकी से क्षमा मांगने लगा, वसुदेव जी को गले लगा कर उन को बार-बार प्रणाम करने लगा, फिर इस प्रकार देवकी और वसुदेव जी अपने नगर को चले जाते हैं।।
कंस द्वारा देवकी के छह पुत्रों का वध-:
इस प्रकार जब देवकी के गर्भ से प्रथम पुत्र का जन्म हुआ तब वसुदेव नवजात पुत्र को लाकर के कंस को दे दिया, देखते कंस ने कहा वसुदेव तुम बड़े सत्यवादी हो मैंने जाने अनजाने में न जाने तुमसे क्या-क्या नहीं कहा, लेकिन तुमने मुझसे कपट नहीं किया और तुमने अपने वचन का पालन करते हुए अपना पुत्र मुझे ला करके दे दिया इसलिए हे वासुदेव मुझे पता है जैसा कि आकाशवाणी ने कहा था कि देवकी की आठवीं संतान मेरा काल होगी, तो मेरा काल तो आठवीं संतान है इस संतान से मुझे कोई भय नहीं है इसलिए इस संतान को
मैं तुम्हें लौटाता हूं। इस प्रकार जब बालक को लेकर के वासुदेव जी अपने घर आए, उसी समय देवर्षि नारद कंस के महल में पहुंचे और कहने लगे हे राजन! तुने यह क्या किया, जो बालक उल्टा फेर दिया, क्या तुम नहीं जानते कि वसुदेव की सेवा करने को सब देवता आए हैं और ब्रज में जन्म ले भी लिया है देवकी के आठवें गर्भ में श्री कृष्ण जन्म ले सब राक्षसों को मार भूमि का भार उतारेंगे, इतना कहकर नारद मुनि आठ लकीरें खिंची, जब आठो ही आठ गिनती में आई तब डरकर कंस ने लड़के समेत वसुदेव जी को बुला भेजा,और देवकी और वसुदेव को कठोर कारागृह में डालकर के सख्त पहरा लगा दिया गया।और देवकी की प्रथम संतान को पत्थर की शिला पर पटककर उसका वध कर देता है,नारद मुनि तो समझाया समझाए बुझाए चले गए, इस रीति से कंस ने देवकी के छः पुत्र मार दिए।
परीक्षित ने कहा महाराज नारद मुनि जी ने जो अधिक पाप करवाया इसका क्या कारण था समझा कर बताइए, तब सुखदेव बोले राजा नारद मुनि ने जो किया अच्छा किया
क्योंकि अधिक से अधिक पाप करे तो भगवान तुरंत ही प्रकट हो इस कारण से जाकर देव ऋषि नारद ने कंस को पाप करने के लिए उद्धृत किया था।।
देवकी के सातवें गर्भ बलराम जी का आना और देवकी का गर्भपात होना-:
सुखदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे कि हे राजन अब देवकी के सातवें गर्भ में शेषनाग रूप भगवान बलदेव जी आए हैं उसी समय भगवान नारायण ने अपनी योग माया को बुलाया और कहा कि है योग माया तुम जाओ और मेरा एक काम करो इस समय मेरे बड़े भ्राता के रूप में शेषनाग स्वरूप बलदेव माता देवकी के गर्भ में आए हुए हैं अब तुम जाकर के देवकी के आठवें गर्भ को निकाल कर के गोकुल में नंद बाबा के घर जहां वासुदेव जी की पत्नी रोहिणी कंस के डर से छुप कर रह रही है उसके गर्भ में स्थापित कर आओ इस प्रकार जब योग माया जाकर देवकी के सातवें गर्भ का संकर्षण कर के रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर देती हैं और जब कंस को पता लगा कि देवकी के सातवा गर्भपात हो गया है तो कंस को बड़ा आश्चर्य हुआ।
जो छिपाय गर्भ हर लिया, जाए रोहिणी को सो दिया ।
जाने सब पहला आधान, भये रोहिणी के भगवान।।
इस प्रकार श्रावण सुदी चौदस बुधवार को बलदेव जी ने गोकुल में जन्म लिया और माया ने वसुदेव देवकी को जाकर के स्वपन में बता दिया कि मैंने तुम्हारे पुत्र को गर्भ से ले जाकर रोहिणी के गर्भ में रख दिया है तुम किसी बात की चिंता मत करना ।।
भगवान श्री कृष्ण का देवकी के गर्भ से प्रकट होना और वासुदेव द्वारा श्री कृष्ण को गोकुल पहुंचाना-:
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे कि हे परीक्षित इस प्रकार से श्री कृष्ण के बड़े भ्राता बलदेव जी प्रकट हुए। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण देवकी के गर्भ में आए और उनकी माया नंद की नारी यशोदा के उदर में आई। और इधर जब कंस को ज्ञात हुआ कि देवकी का आठवां गर्भ रहा है। तब उसने देवकी और वासुदेव जी के कारागृह का पहरा 4 गुना बढ़ा दिया बड़े-बड़े विशाल शरीर वाले दैत्यों की चौकी बैठा दी और दिन रात का कड़ा पहरा लगवा दिया गया, अब कंस उठते बैठते सोते जागते चारों पहर देवकी के आठवें पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा करने लगा और जब से भगवान श्री कृष्ण माता देवकी के गर्भ में आए हैं समस्त देवी-देवता उनकी गर्भ स्तुति करते हैं वंदन करते हैं इस प्रकार जैसे-जैसे माता देवकी का गर्भ बढ़ने लगा, देवकी को परम आनंद की अनुभूति होने लगी क्यों ना हो जो आज परम आनंद परमात्मा उसके गर्भ में पधारे हैं माता देवकी का गर्भ का प्रकाश सर्वत्र कारागार में फैलने लगा जब पहरियो ने देखा की भयंकर काली निशा में भी देवकी और वासुदेव का कक्ष में प्रकाश फैल रहा है। तब पहरीयो ने जाकर के जांच किया तो पता लगा कि देवकी के गर्भ का प्रकाश सर्वत्र कारागार में फैल रहा है। जब उन्होंने इसकी सूचना महाराज कंश को दी,तो कंस बड़ा उतावला हो कर कारागृह में आया और उस प्रकाश को देख कर के कांपने लगा तथा तलवार से देवकी का वध करने लगा, उसी समय
भगवान शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर कंस के सामने खड़े हो जाते हैं। जिससे कंस की नेत्र ज्योति कुछ समय के लिए चली जाती है इस प्रकार कंस व्याकुल होकर कांपता हुआ डर से कारागृह से चला जाता है। और पहरियों को विशेष निगरानी का निर्देश देता है इस प्रकार से भगवान श्री कृष्ण का गर्भकाल जैसे ही छह-सात महीने का हुआ , तब भगवान श्री कृष्ण ने देवकी और वसुदेव को स्वपन में अपना चतुर्भुज रूप का दर्शन कराया, देवकी वासुदेव जी ने देखा कि उनके गर्भ घर में समस्त देवी-देवता ब्रह्म रूद्र इन्द्र रादि सब देवता अपने अपने विमान छोड़कर उनके कारागृह में आए हुए हैं। और हाथ जोड़कर वेद स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार जब देवकी और वासुदेव जी को स्वपन में परमात्मा ने अपना स्वरूप दिखाया तो देवकी और वसुदेव जी का सारा दुख समाप्त हो गया और उन्हें विश्वास हो गया कि अब की बार हमारे गर्भ में साक्षात् नारायण पधारे हैं।।शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे कि हे राजन!अब भगवान श्री कृष्ण के अवतार का समय आ गया है जब परमात्मा का अवतार लेने का समय आया उस समयतीनों लोगों की प्रकृति मनोरम हो जाती है और अपना पूर्ण श्रृंगार करके मानो भगवान नारायण की स्तुति करने के लिए तत्पर हो रही हो, मंद सुगंध पवन बहने लगी, पक्षी मनोरम कलोले करने लगे, नगर गांव गांव घर घर मंगलाचार होने लगे ब्राह्मण यज्ञ करने लगे दसों दिशाएं हर्षित होने लगी है तथा समस्त देवी-देवता अपने अपने विमानों में बैठ आकाश से पुष्प बरसाने लगे, विद्याधर गंधर्व चारण ढोल बजा कर परमात्मा का गुणगान करने लगे, इसी समय भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि बुधवार रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को बारह बजे भगवान श्री कृष्ण ने महादेव के गर्भ से कारागृह में चतुर्भुज दिव्य रूप में प्रकट हुए, देवकी और वसुदेव परमात्मा के चतुर्भुज रूप को देखकर के हाथ जोड़कर के प्रार्थना करने लगे और कहने लगे कि हे नारायण आदि पुरुष हमारे बड़े भाग्य हैं जो आपने हमें दर्शन दिया और जन्म मरण से मुक्त किया, इस प्रकार स्तुति करने के बाद भगवान श्री कृष्ण देवकी और वसुदेव जी से बोले तुम अब किसी बात की चिंता मत करना क्योंकि मैंने तुम्हारे दुखों को दूर करने के लिए ही अवतार लिया है पर इस समय मुझे गोकुल पहुंचा दो और वहां यशोदा माता के लड़की हुई है उसको लेकर के कंस को दे देना।
नंद यशोदा तब करो, मोहि सो मन लाय।
देख्यो चाहत बाल सुख, रहो कछुक दिन जाय।।
फिर कंस को मारकर तुमसे आकर के मिलूंगा तुम अपने मन में धैर्य धारण करना है वसुदेव देवकी को समझा करके श्री कृष्ण बालक बन कर रोने लगे। और अपनी माया फैला दी तब वसुदेव देवकी का ज्ञान समाप्त हो गया और जाना कि हमारे पुत्र हो गया है यह समझ दंश हजार गायों का दान करो मन में संकल्प कर, लड़के को गोद में उठाकर छाती से लगा लिया।।
उसी देवकी वासुदेव जी से कहने लगी आप किसी प्रकार से हमारे इस बालक को यहां से कहीं दूर छोड़ आओ, जिससे कंस पापी के हाथ से यह बस जाए, वसुदेव बोले देवी इस कठिन बंधन से कैसे छूट करके इसे ले जाऊं इतनी बात कही रहे थे,कि बैड़िया खुल जाती है सारे पहरेदार गहरी निद्रा में अचेत हो जाते हैं कारागृह के सारे द्वार खुल जाते हैं उसी समय वासुदेव शूप में भगवान श्रीकृष्ण को रखकर के झट से गोकुल की और प्रस्थान करते हैं।।
ऊपर बरसे देव, पीछे सिंह जु गुंजरे।
सोचते हैं वसुदेव, यमुना देखी प्रवाह अति।।
इस प्रकार वसुदेव भगवान श्री कृष्ण को शूप में रखकर अपने मस्तक पर उठा कर गोकुल की यात्रा करते हैं भयंकर काली रात्रि में आगे बढ़ने लगे और यमुना के तट पर आ जाते हैं। भयंकर तेज वर्षा हो रही है।तब से भगवान ने देखा कि मेरे प्रभु वर्षा में भीग रहे हैं तो उन्होंने अपने फनो से भगवान श्री कृष्ण की छाया करने लगे, इस प्रकार वासुदेव नदी के तीर पर खड़े हो कर विचार करने लगे कि पीछे से सिंह बोलता है और आगे यमुना बह रही है अब क्या करूं, तब भगवान का ध्यान धर आगे यमुना पार करने के लिए जाते हैं ज्यों ज्यो नदी पार करने लगे यमुना ने सोचा कि आज भगवान श्री नारायण मेरे द्वार पधारे थे उनका चरण स्पर्श करके मैं अपने जीवन को धन्य बना लूं, इसलिए माता यमुना का जल स्तर बढ़ने लगा धीरे-धीरे पानी वासुदेव जी के मुंह तक पहुंच गया, वासुदेव व्याकुल होने लगे, भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि पिताजी अब व्याकुल हो रहे तो उन्होंने शूप से अपना एक चरण बढ़ाया और चरण का जैसे ही यमुना मैया ने स्पर्स किया, यमुना का जल स्तर कम हो जाता है, इस प्रकार यमुना पार करके जैसे भगवान वसुदेव नंद बाबा के द्वार पहुंचे, वहां देखा कि यशोदा केेेे भवन की खिड़की की खुल रही थी और उस खिड़की में से प्रवेश करके भगवान श्री कृष्ण को माता यशोदा की बगल में सुलाते हैं और माता यशोदा की बगल में नवजात कन्या को लेकर के आ जाते हैं। इस प्रकार भगवान वसुदेव यशोदा की कन्या को लेकर जैसे ही कारागृह में पहुंचते हैं ।परमात्मा की माया से पुरे द्वार बंद हो जाते हैं। बैड़िया लग जाती है और स्थिति बन जाती है जिस स्थिति में पहले थे। अब जैसे ही द्वारपालों की निद्रा भंग हुई, वे तत्काल उठकर कारागृह की ओर दौड़ते हैं। और कारागृह में जा कर देखते हैं कि देवकी के आठवां पुत्र का जन्म हो गया है। द्वारपाल दौड़े दौड़े महाराज कंश के पास पहुंचते हैं और कहते हैं महाराज की जय हो, देवकी के आठवें गर्भ का जन्म हो गया है। अब जैसे कसने सुना कि देवकी के आठवें पुत्र का जन्म हो गया है। हाथ में तलवार लेकर उठता पड़ता दौड़ता कारागृह में आ जाता है, और कारागृह में आकर देवकी वासुदेव जी के हाथ से नवजात कन्या को छीन लेता है। तब देवकी हाथ जोड़कर कहने लगी भैया यह तो कन्या है यह तेरी भांजी है इसे मत मार तूने पहले ही मेरे 6 बालक मार दीये,कन्या को मारने से पाप होता है कंस बोला जीती लड़की न दूंगि , क्योंकि हो सकताा है इसका पतिि मेरा काल बने, ऐसा कह कर के महा पापी कंस ने उस कन्या को उठा कर के जैसे ही पत्थर की शिला पर पटक कर के उसको मारना चाहा वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश मंडल में अष्टभुजा रूप धारण करके कहने लगी हे कंश तू मुझे क्या मारेगा तुझे मारने वाला तो जन्म ले चुका है तू नहीं बचेगा ऐसा कह कर के महामाया अंतर्ध्यान हो जाती है।।इसके बाद कंस कारागृह में आकर के देवकी और वसुदेव जी को कारागृह से मुक्त करता है औरअपने अनुचरो के साथ अपने भवन को चला जाता है और वहां जाकर के अपने मंत्रियों के साथ आपसी मंत्रणा करने लगा।।
गोकुल में श्री कृष्ण जन्मोत्सव व पूतना उद्धार -:
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से कहते हैं कि हे राजन! इस प्रकार जब योग माया अष्टभुजा धारण करके आकाश मंडल में जाकर कंस को चेतावनी देकर अंतर्ध्यान हो जाती है। कंस बड़ा बेचैन रहने लगा और कंस ने उसी रात अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा के लिए विशेष सत्र बुलाया। मंत्रणा प्रारंभ होने लगी, कंस बोला कि देखो आप सब जानते हैं कि आज आकाशवाणी में उस कन्या ने जो कहा है कि मेरा काल कहीं जन्म ले चुका है। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए,? तब कंस के मंत्री ने कहा कि भगवान मेरा सुझाव है की अगर वह हरि पृथ्वी पर जन्म ले चुका है तो हमें वैष्णव भक्तों, गौ, ब्राह्मण, ऋषि-मुनियों, पर अत्याचार बढ़ा देना चाहिए।
और ब्रज मंडल में आज से एक महीने तक की अवधि में जितने भी बालकों का जन्म हुआ है। उनका वध कर देना चाहिए,इस प्रकार जब मंत्री ने महाराज कंस को इस प्रकार का सुझाव दिया।तो कंश बहुत प्रसन्न हुआ, और कहने लगा कि तुमने बहुत ही सुंदर विचार मुझे सुझाया है। मैं आप सभी महान योद्धा ओ, असुरों को आदेशित करता हूं कि ब्रज मंडल में जितने भी आज से एक महीने तक की अवधि के बीच में जितने बच्चों का जन्म हुआ है। उन सब का तुम वध
करोगे, ब्राह्मणों पर अत्याचार करो, उसी समय मंत्री के कहने पर पूतना नाम की एक बहुत बड़ी विशालकाय राक्षसी को बुलाया गया, पूतना महाराज कंस के सामने आकर के उपस्थित होती है। और हाथ जोड़कर कहने लगी हे महाराज कंस कहो किस कारण आज मुझे याद किया गया है? कंस कहने लगा हे पूतना! जाओ और तुम हमारा एक कार्य करो की ब्रज मंडल में एक महीने की अवधि के अंदर जितने भी बालकों का जन्म हुआ है उनको तुम किसी भी प्रकार से काल का ग्रास बना जाओ। पूतना जोर जोर से हंसने लगी और बोली हे भगवान यह मेरे लिए एक छोटा सा कार्य है। आपकी आज्ञा का पालन होगा, ऐसा कहकर के पूतना ब्रजमंडल में रूप बदलकर के वितरण करने लगी। और जहां-जहां जिस घर में भी नवजात बालक दिखाई पड़ते वह उनको काल का ग्रास
बना जाती है।
भये पूत नंद के, सुनो गोकुल गांव।
छलकर अभही आनिहौ, गोपी बनकै ही जाऊं।।
और इस प्रकार जब प्रातकाल हुआ माता यशोदा ने देखा कि उसकी बगल में बालक खेल रहा है।दौड़ी-दौड़ी नंद बाबा की बहन सुनंदा आई और सुनंदा ने देखा कि भाभी ने पुत्र को जन्म दिया है। खुशी से आनंदित होती हुई दौड़ी-दौड़ी नंद बाबा के पास जाती है। और कहती है बाबा बाबा एक खुशखबरी सुनाने आई हूं, नंद बाबा कहने लगे कि सुनंदा बताओ तो कौन सी खुशखबरी तुम मुझे सुनाने आई हो ,सुनंदा कहने लगी बाबा पहले बताओ खुशखबरी के बदले में मुझे क्या उपहार दोगे, नंदबाबा उत्सुकता से कहने लगे हे सुनंदा बताओ तो सही कौन सी खुशखबरी तुम मुझे सुना रही हो, तब सुनंदा कहने लगी भ्राता श्री हमारे घर एक नन्हे से मेहमान का आगमन हुआ है भाभी ने सुंदर पुत्र को जन्म दिया है। जैसे ही नंद बाबा ने सुना कि उनके घर पुत्र का जन्म हुआ है नंद बाबा के प्रेम का कोई ठिकाना नहीं रहा प्रेम की अश्रु धारा बहने लगी, प्रेम के सागर में गोते खाने लगे, और नंद बाबा ने यह समाचार सुनकर के पूरे गोकुल में ढिंढोरा पिटवा दिया गया, सारे गोकुल वासी एकत्रित हो कर नंद बाबा को पुत्र प्राप्ति की बधाइयां देने लगे, नंदबाबा दोनों हाथों से गोकुल वासियों को उपहार बांटने लगे, और गोकुल में आनंद बरसने लगा, क्यों नहीं होता जो आज साक्षात परम आनंद गोकुल में पधारे हैं। इस प्रकार सारे गोकुल वासी बड़े आनंदित होकर नाचने लगे, गाने लगे सर्वत्र सभी गोकुल वासी प्रेम आनंद में मगन हो रहे हैं। और नंद बाबा अपने दोनों हाथों से उपहार लुटा रहे हैं। इस प्रकार गोकुल में भगवान का जन्मोत्सव मनाया गया, तब नंद बाबा महाराज कंस का वार्षिक कर्ज चुकाने के लिए छकडो में मक्खन के मटके इत्यादि रसद सामग्री भर कर के कुछ ग्वालों के साथ मथुरा आते हैं। और कंस का वार्षिक कर्ज चुका कर अपने परम मित्र वासुदेव से मिलने पहुंचते हैं। नंद बाबा और वासुदेव दोनों गले मिलकर के बड़े आनंदित होते हैं। नंद बाबा कहने लगे हे वासुदेव! मैं जानता हूं कि दुष्ट कंस ने तुम्हारे नवजात बालकों को मार दिया और तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया है।लेकिन इसे भी ईश्वर की मर्जी ही मान करके विश्वास करना चाहिए।इस प्रकार आपसी चर्चा करते हुए वसुदेव जी कहने लगे हे नंदलाल जी मेरा रोहिणी पुत्र कैसा है? तब नंद बाबा ने रोहिणी पुत्र बलदेव जी की सकुंलता का वृतांत सुनाया और अपने पुत्र जन्म का
वृत्तांत बताया। वसुदेव देवकी बहुत प्रसन्न हुए, और कहने लगे हे नंदलाल जी ईश्वर की कृपा है आपको इस अवस्था में पुत्र की प्राप्ति हुई है। जब इस प्रकार से बातें कर रहे थे तभी वसुदेव जी नंद बाबा से कहने लगे, हे नंदराय जी! न जाने मेरा मन कुछ आशंकाओं से घिरा हुआ है मुझे ऐसा लग रहा है कि गोकुल में कुछ अशुभ होने वाला है। क्योंकि आजकल कंस के दुराचारी अनुचर संपूर्ण ब्रजमंडल में विचरण करते हुए सज्जनों को कष्ट पहुंचा रहे हैं। अतः अब आपने महाराज कंस का वार्षिक कर्ज भी चुका दिया तुम्हारा हमारा मिलन भी हो गया अब आप बिना विलंब किए गोकुल को प्रस्थान करना चाहिए। इस प्रकार नंद बाबा वासुदेव , देवकी से विदा लेकर अपने ग्वाल सखाओ के साथ गोकुल की ओर प्रस्थान करते हैं।।
वृत्तांत बताया। वसुदेव देवकी बहुत प्रसन्न हुए, और कहने लगे हे नंदलाल जी ईश्वर की कृपा है आपको इस अवस्था में पुत्र की प्राप्ति हुई है। जब इस प्रकार से बातें कर रहे थे तभी वसुदेव जी नंद बाबा से कहने लगे, हे नंदराय जी! न जाने मेरा मन कुछ आशंकाओं से घिरा हुआ है मुझे ऐसा लग रहा है कि गोकुल में कुछ अशुभ होने वाला है। क्योंकि आजकल कंस के दुराचारी अनुचर संपूर्ण ब्रजमंडल में विचरण करते हुए सज्जनों को कष्ट पहुंचा रहे हैं। अतः अब आपने महाराज कंस का वार्षिक कर्ज भी चुका दिया तुम्हारा हमारा मिलन भी हो गया अब आप बिना विलंब किए गोकुल को प्रस्थान करना चाहिए। इस प्रकार नंद बाबा वासुदेव , देवकी से विदा लेकर अपने ग्वाल सखाओ के साथ गोकुल की ओर प्रस्थान करते हैं।।
उधर आकाश मंडल में अदृश्य हो कर पूतना ब्रजमंडल में विचरण करते हुए नवजात शिशु का भक्षण करने लगी। जब वह आकाश मंडल से गोकुल के ऊपर से गुजर रही थी, तो उसने देखा कि नंदराय जी के घर के आंगन में नवजात बालक पालने में खेल रहा है। तो पूतना ने गोकुल में आकर अपना दिव्य सुंदर रूप बनाया और ग्वालन रूप बनाकर के मटकती हुई चाल से नंदराय जी के घर आती है। पूतना को देख कर सारे गोकुल वासी बड़े आश्चर्य चकित होने लगे, कि ऐसी गोपी तो हमने शायद पहले नहीं देखी, फिर भी हो सकता है मथुरा जनपद से कोई गोपी नंदराय जी के बालक को बधाई देने के लिए आई हो, ऐसा विचार करने लगे, और पूतना जैसे ही नंदराय जी के घर पहुंची और कहने लगी, अरी यशोदा,ओ यशोदा! मैं तो तेरे पुत्र का मुंह देखने के लिए आई हूं बधाई हो बधाई हो पुत्र प्राप्ति की बहुत-बहुत बधाई हो, ऐसा कहती हुई जब पूतना नंदलाल जी के भवन पहुंच गई और यशोदा जी को बधाई देने लगी श्री कृष्ण का मुंह देखने की कामना करने लगी, यशोदा अपने पुत्र को पूतना की गोद में लाकर दे देती है। और यसोदा घर के किसी दूसरे कार्य में लग गई, उसी समय
पूतना अपना आंचल खोल करके भगवान श्री कृष्ण को स्तनपान कराने लगी क्योंकि पूतना अपने स्तनों के विष लगा कर आई है। इस प्रकार जब भगवान श्री कृष्ण को विष लगा स्तनपान पूतना कराने लगी, भगवान श्री कृष्ण आंखें मूंदकर के पूतना का स्तनपान करने लगे, और स्तन पान के साथ-साथ पूतना के प्राणों का भी पान करने लगे, जैसे जैसे पूतना के प्राण खिछने लगे उसके शरीर में भयंकर वेदना होने लगी, पूतना जोर से चिल्लाने लगी, अरे यह तुम क्या कर रहे हो, क्या कर रहे हो, कहती हुई चिल्लाने लगी, और अपना विशाल स्वरूप बनाकर श्री कृष्ण को लेकर आकाश में उड़ने लगी, ।इस प्रकार जब पुतना आकाश मंडल में उड़ने लगी, गोकुल वासियों ने देखा कि पूतना नंद बाबा के लल्ला को लेकर के आकाश में उड़ रही है। सारे गोकुल वासी विलाप करने लगे मां यशोदा रोहिणी सब जोर-जोर से विलाप करने लगी, माता यशोदा मूर्छित हो जाती है। जब सारे गोकुल में हाहाकार मचने लगा भगवान श्री कृष्ण ने पूतना के पयपान के साथ-साथ उसके प्राणों का भी पार कर लिया और पूतना का मृत शरीर ब्रज मंडल के बाहर जाकर के एक विशालकाय भूमंडल पर गिरता है। शास्त्र कहते हैं जब पूतना का शरीर पृथ्वी पर गिरा तो छः कोस तक की धरती के वृक्ष टूट करके गिर जाते हैं। जब इस प्रकार गोकुल वासियों ने देखा कि पूतना राक्षसी का शरीर गोकुल के बाहर जाकर के गिरा है। सारे के सारे गोकुल वासी वहां पहुंचे और वहां जाकर के देखा कि पूतना के पर्वताकार शरीर पर नंदलाल खेल रहे हैं। गोकुल वासियों को बड़ा आश्चर्य हुआ, मां यशोदा दौड़ी दौड़ी आ कर अपने पुत्र कन्हैया को अपने गले से लगा लेती है। और उसी समय 1000 गायों का दान करने का संकल्प करती है। अपने लल्ला को चूमने लगी, सारे गोकुल वासी बड़े आनंदित होकर भगवान की जय-जयकार करने लगे और ईश्वर की कृपा की दुहाई देने लगे।इस प्रकार अब गोकुल वासियों ने विचार किया कि इतने विशालकाय पर्वताकार पूतना के शरीर का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए, तब सारे गोकुल वासी पूतना के इस विशाल शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े कर करके उसको जला देते हैं। जब पूतना का शरीर जलने लगा तो उसमें से इतनी सुंदर सुगंध तीनों लोकों में फैलने लगी। इस प्रकार हे राजन! जैसे ही नंद बाबा गोकुल पहुंचे उन्होंने जाकर देखा की पूतना का शरीर जल रहा है, सारा वृत्तांत जब नंद बाबा को गोकुल वासियों ने बताया, नंद बाबा ने सबसे पहले तो भगवान को धन्यवाद दिया, और कहने लगी हो न हो निश्चित रूप से वासुदेव एक बहुत बड़े ज्योतिषी हैं, उन्होंने मुझे मथुरा में पहले ही बता दिया था कि गोकुल में कुछ अशुभ घटित होने वाला है।। इस प्रकार हे राजन! पूतना का अंतिम संस्कार गोकुल वासियों ने किया। राजा परीक्षित कहने लगे भगवान अभी आपने मुझे बताया कि पूतना के उस मृत शरीर से सुगंधित धुआं त्रिलोकी में फैली लगा ऐसा कैसे संभव हो सकता है क्योंकि पूतना तो राक्षसी थी और वह तो बालघातनी, और बालकों को काल का ग्रास बनानेे वाली थी।
फिर उसके मृत शरीर से ऐसी सुगंधित धुआं कैसे निकलने लगी। सुखदेव जी कहने लगे हे परीक्षित! यह सत्य है कि पूतना बालघातनी थी राक्षसी थी फिर भी उसने परमात्मा नारायण की माता का गौरव प्राप्त किया है क्योंकि जिसका स्तनपान स्वयं परमात्मा ने करके अपनी माता का गौरव प्रदान किया हो उसकी दुर्गति कैसे हो सकती है। इस कारण भगवान श्री कृष्ण ने बाल घातनी पूतना को भी अपनी माता के समान परम गति प्रदान की है।।
इस प्रकार शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओ का वर्णन करते हुए कहने लगे कि हे परीक्षित! जब भगवान श्री कृष्ण 28 दिन की हुए।तो आज उनका जन्म नक्षत्र था इस उपलक्ष में नंदराय जी ने सारे गोकुल में भोज का आयोजन किया था। तथा सारे गोकुल वासी एकत्रित होकर आनंदोत्सव मना रहे थे। उस समय माता यशोदा ने अपने लाल कन्हैया को पालने में सुला कर शकटे के नीचे सुला रखा था। और शकटे के ऊपर माखन के मटके रखे हुए थे। और सभी गोप ग्वाल आनंद उत्सव मनाने में मगन हो रहे थे। उसी समय कंस का भेजा हुआ एक दैत्य उस सकटे के ऊपर आकर बैठ गया और उसको जोर से पटक कर भगवान श्री कृष्ण को मारना चाहा, तब भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपने पालने में से अपना एक चरण निकाल कर के जैसे सकटे को स्पर्श किया। सकटा जोर से आकाश में उड़ने लगा और कुछ समय बाद सकटा भूमंडल पर गिरकर चकनाचूर हो गया जब ग्वाल बालों ने नंदराय यशोदा जी ने देखा कि सकटा आकाश मंडल में उगता हुआ नीचे गिरकर के चकनाचूर हो गया। तब वहां पर खेल रहे कुछ बालको ने देखा कि नंद लाला ने अपने चरण से जब सकटे को स्पर्श किया तो सकटा आकाश में उड़ कर नीचे गिर कर टूट गया। लेकिन किसी ने भी उन बालको की बात पर विश्वास नहीं किया। और माता यशोदा ने अपने लाल को अपने आंचल से लगा कर के ईश्वर को धन्यवाद देने लगी । कि आज भी ईश्वर की कृपा है कि उन्होंने आज मेरे पुत्र को बहुत बड़े खतरे से बचा लिया।।
पूतना अपना आंचल खोल करके भगवान श्री कृष्ण को स्तनपान कराने लगी क्योंकि पूतना अपने स्तनों के विष लगा कर आई है। इस प्रकार जब भगवान श्री कृष्ण को विष लगा स्तनपान पूतना कराने लगी, भगवान श्री कृष्ण आंखें मूंदकर के पूतना का स्तनपान करने लगे, और स्तन पान के साथ-साथ पूतना के प्राणों का भी पान करने लगे, जैसे जैसे पूतना के प्राण खिछने लगे उसके शरीर में भयंकर वेदना होने लगी, पूतना जोर से चिल्लाने लगी, अरे यह तुम क्या कर रहे हो, क्या कर रहे हो, कहती हुई चिल्लाने लगी, और अपना विशाल स्वरूप बनाकर श्री कृष्ण को लेकर आकाश में उड़ने लगी, ।इस प्रकार जब पुतना आकाश मंडल में उड़ने लगी, गोकुल वासियों ने देखा कि पूतना नंद बाबा के लल्ला को लेकर के आकाश में उड़ रही है। सारे गोकुल वासी विलाप करने लगे मां यशोदा रोहिणी सब जोर-जोर से विलाप करने लगी, माता यशोदा मूर्छित हो जाती है। जब सारे गोकुल में हाहाकार मचने लगा भगवान श्री कृष्ण ने पूतना के पयपान के साथ-साथ उसके प्राणों का भी पार कर लिया और पूतना का मृत शरीर ब्रज मंडल के बाहर जाकर के एक विशालकाय भूमंडल पर गिरता है। शास्त्र कहते हैं जब पूतना का शरीर पृथ्वी पर गिरा तो छः कोस तक की धरती के वृक्ष टूट करके गिर जाते हैं। जब इस प्रकार गोकुल वासियों ने देखा कि पूतना राक्षसी का शरीर गोकुल के बाहर जाकर के गिरा है। सारे के सारे गोकुल वासी वहां पहुंचे और वहां जाकर के देखा कि पूतना के पर्वताकार शरीर पर नंदलाल खेल रहे हैं। गोकुल वासियों को बड़ा आश्चर्य हुआ, मां यशोदा दौड़ी दौड़ी आ कर अपने पुत्र कन्हैया को अपने गले से लगा लेती है। और उसी समय 1000 गायों का दान करने का संकल्प करती है। अपने लल्ला को चूमने लगी, सारे गोकुल वासी बड़े आनंदित होकर भगवान की जय-जयकार करने लगे और ईश्वर की कृपा की दुहाई देने लगे।इस प्रकार अब गोकुल वासियों ने विचार किया कि इतने विशालकाय पर्वताकार पूतना के शरीर का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए, तब सारे गोकुल वासी पूतना के इस विशाल शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े कर करके उसको जला देते हैं। जब पूतना का शरीर जलने लगा तो उसमें से इतनी सुंदर सुगंध तीनों लोकों में फैलने लगी। इस प्रकार हे राजन! जैसे ही नंद बाबा गोकुल पहुंचे उन्होंने जाकर देखा की पूतना का शरीर जल रहा है, सारा वृत्तांत जब नंद बाबा को गोकुल वासियों ने बताया, नंद बाबा ने सबसे पहले तो भगवान को धन्यवाद दिया, और कहने लगी हो न हो निश्चित रूप से वासुदेव एक बहुत बड़े ज्योतिषी हैं, उन्होंने मुझे मथुरा में पहले ही बता दिया था कि गोकुल में कुछ अशुभ घटित होने वाला है।। इस प्रकार हे राजन! पूतना का अंतिम संस्कार गोकुल वासियों ने किया। राजा परीक्षित कहने लगे भगवान अभी आपने मुझे बताया कि पूतना के उस मृत शरीर से सुगंधित धुआं त्रिलोकी में फैली लगा ऐसा कैसे संभव हो सकता है क्योंकि पूतना तो राक्षसी थी और वह तो बालघातनी, और बालकों को काल का ग्रास बनानेे वाली थी।
फिर उसके मृत शरीर से ऐसी सुगंधित धुआं कैसे निकलने लगी। सुखदेव जी कहने लगे हे परीक्षित! यह सत्य है कि पूतना बालघातनी थी राक्षसी थी फिर भी उसने परमात्मा नारायण की माता का गौरव प्राप्त किया है क्योंकि जिसका स्तनपान स्वयं परमात्मा ने करके अपनी माता का गौरव प्रदान किया हो उसकी दुर्गति कैसे हो सकती है। इस कारण भगवान श्री कृष्ण ने बाल घातनी पूतना को भी अपनी माता के समान परम गति प्रदान की है।।
शकटासुर और तृणावर्त नामक दैत्य का संहार-:
जिहिननक्षत्रमोहनभये, सो नक्षत्र परो आय।
चारूबधाय रीति सब,करति यसोदा माय।।
इस प्रकार हे राजन! जब नंदलाल कन्हैया पांच महीने के हो गए, तब कंस का भेजा हुआ तृणावर्त नाम का एक दैत्य
गोकुल में आया और नंदलाला को मारना चाहा। उसी समय वह दैैैैत्य हवा का बवंडर रूप धारण करके गोकुल में आया है। भगवान श्री कृष्ण उस समय माता यशोदा की गोद में पय
पान कर रहे थे। उसी समय उन्होंने अपना भार बढ़ाया अर्थात इतने भारी हो गए कि माता यशोदा ने अपने लल्ला को अपनी गोदी से नीचे उतार दिया।तो उसी समय वह तृणावर्त दैत्य
बवंडर रूप लेकर के गोकुल में आया उसने अपना स्वरूप बढ़ाया और पूरे गोकुल को उसने हवा के वंडर से घेर लिया। दिन की रात हो गई । एक हाथ से दूसरा हाथ भी नहीं दिखाई दे रहा था। इतने भयंकर तूफानी बवंडर में सारे गोकुल वासी भय से कांपने लगे विलाप करने लगे हैं हाय हाय कर जोर से चिल्लाने लगे। उसी समय भगवान श्री कृष्ण को तृणावर्त उठाकर के आकाश में ले गया और कन्हैया ने अपने छोटे-छोटे दोनों हाथों से उस दुष्ट देत्य के गले को पकड़ लिया। और जब देखा कि सारे गोकुल वासी बड़े व्याकुल हो रहे हैं तब उन्होंने अपने छोटे-छोटे दोनों हाथों से उसका गला दबा दिया। जिससे उसकी श्वास गति रुक गई और मुंह से खून की धारा बहने लगी, अतः वह देत्य पीड़ा से जोर से कहराकर
चिल्लाने लगा, और तत्काल वह देत्य अपने असली रूप में आकर भूमंडल पर गिर गया और उसके शरीर से एक ज्योति निकली वह देखते-देखते भगवान श्री कृष्ण के हृदय में समा गई। उसके मरते हि गोकुल में आया बवंडर समाप्त हो जाता है। और प्रकाश हो गया तब उसके मृत शरीर को देखकर सारे गोकुल वासीयो को बड़ा आश्चर्य हुआ। माता यशोदा विलाप करती हुई अपने कन्हैया को अपनी गोद में ले कर उनका मुंह चूमने लगी। नंदराय जी भी बड़े प्रसन्न हुए और ईश्वर को बार-बार धन्यवाद कहने लगे।।
श्री कृष्ण का नामकरण संस्कार व माता यशोदा को दिव्य दर्शन -:
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से कहते हैं कि हे राजन! इस प्रकार राम और श्याम धीरे-धीरे गुटनो के बल चलने लगे हैं और उनकी बाल लीलाओं को देखकर मां यसौदा नंदबाबा रोहिणी तथा समस्त गोकुल वासी बड़ी आनंदित होते है। एक दिन वासुदेव जी ने गर्ग मुनि के चरणों में जाकर प्रार्थना की, कि हे गुरुदेव आप कृपा करके गोकुल जाइए और वहां जाकर हमारे पुत्रों का नामकरण संस्कार करें, वसुदेव जी के कहने पर महामुनि गर्गाचार्य जी गुप्त रीति से गोकुल में पहुंचे और वहां जाकर जैसे ही नंद द्वार गए, नंद बाबा बड़े प्रसन्न हुए और यथोचित स्वागत सत्कार अभिनंदन किया। फिर नंद बाबा और नंद रानी जी हाथ जोड़कर प्रार्थना कर कहने लगे, हे भगवान! आप कृपा करके मेरे पुत्र और रोहिणी पुत्र का नामकरण संस्कार करने की कृपा करें, गर्गाचार्य जी बोले हे नंद बाबा! आप के पुत्रों का नामकरण संस्कार करना मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है पर एक बात ध्यान रखो क्योंकि मैं विश्व में यदुकुल का पुरोहित हूं अगर किसी प्रकार से राजा कंस को यह बात ज्ञात हो गई कि मैंने तुम्हारे पुत्रों का नामकरण संस्कार किया है तो वह दुष्ट न जाने क्या समझ कर के हमें कष्ट पहुंचा सकता है। जब इस प्रकार गर्गाचार्य जी ने नंदलाल जी से कहा नंद बाबा बोले भगवन आपका कथन पूर्ण सत्य है आप चिंता ना कीजिए हम इस प्रकार गुप्त रीति से अपने पुत्रों का नाम संस्कार कर दीजिए अर्थात एकांत स्थान गोशाला में चल करके इनका नामकरण संस्कार कीजिए, और इसका पता किसी को भी नहीं लगेगा, जब नन्दबाबा ने ऐसा कहा तो गर्गाचार्य जी नामकरण संस्कार करने के लिए तैयार हो जाते हैं। और गौशाला में पधारे हैं जब राम और श्याम को लेकर के मां यशोदा और रोहिणी गौशाला में पहुंची है। भगवान का दिव्य रूप को देखकर के गर्चागार्य जी आनंद विभोर हो गए और फिर कहने लगे हैं। हे नंदबाबा! अब मैं तुम्हारे पुत्र व रोहिणी नंदन का नामकरण संस्कार करता हूं।यह जो रोहिणी का पुत्र है इसमें असीमित बल होगा इसलिए इसका नाम होगा बलराम, इनका प्रिय आयुध हल होगा इसलिए इनका दूसरा नाम हलधर भी होगा तथा इनका एक नाम संकर्षण होगा। तथा अनेक बार यह बालक गोकुल वासियों कीअनेक प्रकार से रक्षा करेगा। अब मैं
यशोदा पुत्र का नामकरण संस्कार करता हूं। नन्द राय जी यह आपका पुत्र पहले कभी वासुदेव जी के घरभी जन्मा था इसलिए इसका एक नाम होगा वासुदेव दूसरा इसका समय-समय पर बहुत सारे जन्म होते रहते हैं अबकी बार इनका वर्ण कृष्ण है अतः इनका एक नाम होगा कृष्ण तथा जैसे-जैसे यह अनेकों लीलाएं करेगा जिसके आधार पर इनके अनेकों
नाम होंगे। और इस प्रकार यह दोनों बालक राम और श्याम अपने पराक्रम से अनेक दुष्ट दैत्यो का संहार करने वाले होंगे। इस प्रकार गर्गाचार्य जी दोनों पुत्रों का नामकरण संस्कार करके प्रभु को मन ही मन में अभिनंदन प्रणाम किया और फिर नंद बाबा से विदा लेकर अपने आश्रम में आ जाते हैं और सारा वृत्तांत वासुदेव जी को कह सुनाते हैं।
गई रोहिणी गर्भ सो,भयो पूत है ताहि।
किती आयु कैसो बली,कहिए नाम तो कहीं।।
इस प्रकार हे राजन! गर्गाचार्य जी ने भगवान श्री कृष्ण बलराम जी का नामकरण संस्कार किया। कृष्ण और बलराम धीरे-धीरे अपन अपने घुटनों के बल चलने लगे हैं। एक दिन की बात है कन्हैया अपने आंगन की मिट्टी अपने मुंह में लेकर खाने लगे जब मैया ने देखा कि मेरा लल्ला मिट्टी खा रहा है तो मैया दौड़ी दौड़ी आई और कन्हैया को अपने गोद में लेकर कहने लगी अरे कनवा तू ने मिट्टी खाई है अपना थोड़ा मुंह तो खोलना, कन्हैया कहने लगे नहीं मैया मैंने माटी नहीं खाई, तब मां यशोदा भगवान को डांटते करने लगी, अरे तू झूठ बोलता है जरा अपना मुंह तो खोल मैं देखूं तो सही कि तू ने मिट्टी खाई है या नहीं खाई, तब भगवान ने जैसे ही अपना मुंह खोला,यसोदा कन्हैया के मुंह को देखने लगी तो मैया ने देखा कन्हैया के मुंह में संपूर्ण ब्रह्मांड दृष्टिगोचर हो रहा है नक्षत्र तारे विचरण कर रहे हैं ऐसे दिव्य विराट रूप को देख कर मैया की बुद्धि चक्राने लगी और बेसुध होकर मूर्छित हो जाती है। जब मैया की मूर्छा दूर हुई तो मन में विचार किया कि मैंने क्या देखा था लेकिन उसे स्वपन मान करके मैया भूला देती है और अपने पुत्र कन्हैया को अपने आंचल से लगा कर प्रेम करने लगती है।।
श्री कृष्ण की माखन चोरी की लीला -:
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे कि हे राजन! जैसा कि मैंने तुम्हें बताया कि प्रभु कृष्ण और बलराम अपनी बाल लीला दिखाने लगे हैं अब राम और श्याम घुटनों के बल से उठकर के पैरों के बल चलने लगे और नंद बाबा के आंगन सहित गोकुल की कुंज गलियों में बिचरणे लगे हैं और अपनी बाल सुलभ लीलाओ से सभी गोकुल वासियों को आनंदित करने लगे, एक दिन कन्हैया अपने ही घर में चोरी करने लगे और जैसे ही कन्हैया अपने घर के एक कक्ष में जाकर के अपने छोटे छोटे हाथों से मटका में से माखन खा रहे थे। उसी समय मैया यशोदा आ जाती है। मैया को देखकर कन्हैया कहने लगी मैया मैया देखो ना मैं माखन नहीं खा रहा हूं तुमने मेरे हाथ में जो यह सोने का कड़ा पहना रखा है ।
वह इतना गर्म था जिससे मेरा हाथ जलने लगा इसलिए मैंने माखन के मटके में डालकर अपने हाथ को ठंडा कर रहा था कन्हैया की ऐसी बाल चपलता को सुनकर के मैया कहने लगी अरे कनवा तू बहुत चालाक हो गया है। नहीं मैया मैं सच कह रहा हूं मैं माखन नहीं खा रहा था मैं तो अपने कड़े की जलन को कम कर रहा था। इसी क्रम में एक दिन कन्हैया अपने भवन में अकेले छुप कर माखन खा रहे थे। तो उन्होंने अपने भवन के खंभों में जब अपनी परछाई देखी तो उस परछाई को देखकर के कहने लगे देखो भैया तुम मैया यशोदा से मत कहना कि मैंने माखन चुराया है मैं तुम्हें सत्य कहता हूं आधा माखन तुझे भी मिलेगा। जब कन्हैया अपनी परछाई से इस प्रकार बातें कर रहे थे उसी समय मां यशोदा वहां चली जाती है माता को देख कर कन्हैया कहने लगे देखो मैया मैं माखन नहीं खा रहा हूं।अपने घर में यह जो मेरी शक्ल का कोई चोर आया है वह माखन चुरा रहा था इसलिए मैं उससे कह रहा था कि अगर तू माखन चुरावोगे तो मैं मैया से कहूंगा। यह है कि जो मानता ही नहीं है ऐसी कन्हैया के मुंह से चपल बातों को सुनकर माता यशोदा बड़ी आनंदित होती है ।।
सूने घर में ढूंढै जाए, जो,पावे सो देयं लुटाय। जिनको घर में सोते पावै,जिनकी ढकीदहीढरकावै।
दूध दही माखन महीं, बच नहीं ब्रज मांझ।
ऐसी चोरी कर तु है, फिर तु भौर उरू सांझ।।
सुनकै कान्हकहतततुराय,मत मैया तुम इन्हें पतियाय।
झूठी गोपी झूठी बोलैं,मेरे पीछे लागी डोलै।।
इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने बाल सखाओ के साथ अपने घर में माखन चोरी के साथ-साथ गोकुल की गोपियों के घरों में भी माखन चोरी की लीला करने लगे हैं। और गोपियां उनकी चोरी की लीला को देखकर ब्रह्मानंद को प्राप्त कर रही है।कन्हैया अपने बाल सखाओ की टोलियों को ले जाकर गोपियों के घर में चोरी करने लगे और गोपियां कहीं बाहर श्रीकृष्ण को पकड़कर ढाटती है और जब कन्हैया रोने
लगते हैं तो फिर बड़े प्रेम से उनके आंखों के आंसू पूछ कर प्रेम करती है। गोपियां जब मां यशोदा को कन्हैया की माखन चोरी की शिकायत करती है माता यशोदा कन्हैया को ढाटती
है। एक दिन कन्हैया अपने बाल सिखाओ के साथ किसी गोपी के घर में माखन चोरी कर रहे थे उसी समय गोपि आ करके श्री कन्हैया को चोरी करते हुए बाल सिखाओ के साथ पकड़ लेती है। और श्रीकृष्ण को हाथ पकड़कर के नंदरानी जी के पास ले जाती है और कहती है। हे नंदरानी जी देखो आज मैं चोर को पकड़कर के लाई हूं, तुम कहती हो कि मेरा पुत्र चोरी नहीं करता है मैं आज अपनी आंखों से देख कर के अपने साथ पकड़ कर के तुम्हारे लल्ला को तुम्हें दिखाने लाई हूं तो कन्हैया मां यशोदा जैसे ही बाहर आ करके कहती है। अरे गोपी तुम यह क्या कह रही हो मेरा कन्हैया तो अंदर भोजन कर रहा है और आवाज लगाती है अरे कन्हैया आओ तो सही बेटा जरा बार तो आओ, जब कन्हैया हाथ में माखन रोटी लेकर के द्वार पर आते हैं, कन्हैया को द्वार पर देख कर गोपी बहुत चकित रह जाती है और जैसे ही अपना पल्लू को हटाया तो देखा कि गोपी अपने बालक को ही हाथ पकड़ कर के ले आई है। इसको देख कर के गोपी को बड़ा आश्चर्य हुआ और कन्हैया की लीला को मन ही मन में प्रणाम करके लज्जित होकर के वहां से चली जाती है। और कन्हैया कहते हैं देखो भैया ये गोपियां भी मेरे को बिना मतलब ही चोर बताती है क्या अपने घर में माखन की कमी थोड़ी है जो गोपियों के घर माखन चुरा ने जाता हूं ऐसी बाल सुलभ लीला कन्हैया गोकुल की गोपियों के साथ करते हैं। और गोपियां उनकी बाल लीलाओं को देखकर के आनंदित होती है। कभी कन्हैया पत्थर मारकर के पानी भरने जाती हुई गोपियों के मटके फोड़ देते हैं तो कभी दूध दुहाती हुई गोपियों के बछड़े खोल देते हैं। कभी किसी सोती हुई गोपी के कान में जोर से आउऊ करके पुकारते हैं तो कभी पास पास में सोती हुई दो गोपियों की दोनों छुट्टियों को बांध देते हैं और फिर जोर से हाउ की आवाज करते हैं गोपियां जैसे झटके से खड़ी होती है तो भूत भूत करके चिल्लाने लगती है उसी समय कन्हैया हंसकर के ताली पीट करके वहां से भाग जाते हैं। ।
श्री कृष्ण का उलूखल बंधन और यमलार्जुन मोक्ष -:
शुकदेव मुनि राजा परीक्षित से कहने लगे कि हे राजन! इस प्रकार एक बार मैया यशोदा अपने लल्ला को अपनी गोद में बिठा कर दूध पिला रही थी उसी समय चुल्हे के ऊपर दूध गर्म हो रहा था तो दूध उफनने लगा तो माता यशोदा कन्हैया को झटके से अपनी गोद से उतार कर के नीचे बिठा देती है और दूध को संभालने के लिए चले जाती है। इधर कन्हैया सुबह-सुबह करके रोने लगे और मन में विचार करने लगे मैया को दिए तो दूध बड़ा है पूत नहीं अर्थात मैया पूत से भी बड़ा दूध को महत्व देती है इसलिए कन्हैया को क्रोध आ जाता है और घर में रखी सभी माखन की मटकीय़ को छड़ी से फोड़ देते हैं और सारे घर में माखन ही माखन फैला देते हैं और माखन भर भर के बंदरों को लूटाने लगे, जब मैया आकर देखती है कि कन्हैया अपने घर के सारे मटको को छड़ी से फोड कर माखन को फैला दिया है और फिर माखन भर भर के बंदरों को खिला रहे हैं। मानो यहां भगवान श्री कृष्ण राम अवतार
का कर्ज़ बंदरों को माखन लुटा करके चुका रहे हो। इस प्रकार मैया ने जब माखन के मटको को फोड़ते हुए देखा तो मैया क्रोधि हो जाती है और हाथ में छड़ी लेकर के भगवान श्री कृष्ण के पीछे दौड़ने लगी, अरे आज मैं तेरी खेर लेकर रहूंगी तू बड़ा चपल हो गया है। ऐसा कहकर आगे आगे भगवान श्री कृष्ण दौड़ने लगे पीछे-पीछे माता यशोदा, भगवान माता यशोदा के हाथ नहीं लगते हैं। माता यशोदा के शरीर में पसीने बहनें लगे। कन्हैया ने देखा कि मैया अब थक चुकी है तो कन्हैया धीरे धीरे चलने लगे और मैया के हाथ लग जाते हैं। माता यशोदा कन्हैया को पकड़ कर अपने घर ले जाती है और छड़ी से डांटने लगी अरे तू बड़ा नटखट हो गया है आज मैं तेरी खेर लेकर रहूंगी, मैं तेरे को अभी रस्सी से बांधती हूं और तेरे बाबा को आने दे तेरी पिटाई करवाऊंगी। ऐसा करके माता यशोदा रस्सी ले कर भगवान श्री कृष्ण को बांधने लगी है। लेकिन यहां एक बडी आश्चर्य कारी घटना होती है। कि जो भी रस्सी माता लेकर आती है तो वह दो अंगुल छोटी पड़ जाती है। माता यशोदा अपने घर की सारी रसिया जोड़ देती फिर भी कन्हैया बंधने में नहीं आ रहे हैं। आते भी कैसे क्योंकि ब्रह्म को कभी भी माया नहीं बांध सकती है। लेकिन जब मैया थक गई तो कन्हैया ने मां की यह दशा देखी नहीं गई और अपनी इच्छा से बन्ध जाते हैं। इस प्रकार कन्हैया को बांधकर के माता अपने घर के कार्य करने लग जाती है। उसी समय कन्हैया ने मन में विचार किया कि मुझे यमुना के तट पर जाकर के यमला अर्जुन का उद्धार करना चाहिए। तो कन्हैया उलखूंल के साथ यमुना के तट पर पहुंच जाते हैं। और उस स्थान पर गए जहां पर यमलार्जुन नामक दो अशोक के वृक्ष पास पास में खड़े थे। उन दोनों वृक्षों के बीच में ऊंखूल को फसाया और जोर से धक्का दिया, जिसमें दोनों अशोक के वृक्ष जो उखड जाते हैं और उन दोनों वृक्षों के जोड़ों में से दो दिव्य पुरुष प्रकट हो गए, वे दोनों देव पुरुष भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अभिनंदन प्रणाम करते हैं और उनकी प्रतिमा करके कहते हैं भगवान आपने बड़ी कृपा की है जो हमारा उद्धार किया और वे दोनों ही दिव्य पुरुष श्रेष्ठ विमानों में आरूढ़ होकर के दिव्य लोक को चले जाते हैं। जब माता यशोदा ने आकर के देखा कि कन्हैया वहां नहीं है तो वह चारों और कन्हैया को देखने लगी जबग्वाल बालो ने आ कर कहा कि मैया कन्हैया तो यमुना के तट पर गया है तो नंद बाबा रोहिणी यशोदा व अन्य गोप ग्वाल यमुना के तट पर गए वहां जाकर के देखा कि कन्हैया के पास में दो युगादि अशोक के वृक्ष टूटकर पड़े हैं। इस अद्भुत घटना को देखकर श्रेष्ठ गोप
ग्वालों सहित नंद बाबा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि
दोनों युगो से खड़े वृक्ष कैसे गिर गए, तब गोप बालो ने कहा कि बाबा बाबा हमने देखा था कि कन्हैया ने इन दोनों वृक्षों को अपने ऊंखूल में फंसा करके गिराया और इनकी जड़ों में से दो दिव्य पुरुष भी प्रकट हुए थे जो श्रेष्ठ विमानों में बैठ कर आकाश में चले गए। लेकिन गोप बालों की बातों पर किसी ने भी विश्वास नहीं किया। इसके बाद यशोदा अपने पुत्र की रसिया खोल कर आंखों में से अश्रुधारा बहाती हुई अपने लाला को गले से लगा लेती है। और कहती है कि
कन्हैया अब तू मैया को बहुत तंग करता है ऐसा करके अपने लाला को चूमने लगी, और फिर सभी लोग अपने घर आ जाते हैं।।
ग्वालों सहित नंद बाबा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि
दोनों युगो से खड़े वृक्ष कैसे गिर गए, तब गोप बालो ने कहा कि बाबा बाबा हमने देखा था कि कन्हैया ने इन दोनों वृक्षों को अपने ऊंखूल में फंसा करके गिराया और इनकी जड़ों में से दो दिव्य पुरुष भी प्रकट हुए थे जो श्रेष्ठ विमानों में बैठ कर आकाश में चले गए। लेकिन गोप बालों की बातों पर किसी ने भी विश्वास नहीं किया। इसके बाद यशोदा अपने पुत्र की रसिया खोल कर आंखों में से अश्रुधारा बहाती हुई अपने लाला को गले से लगा लेती है। और कहती है कि
कन्हैया अब तू मैया को बहुत तंग करता है ऐसा करके अपने लाला को चूमने लगी, और फिर सभी लोग अपने घर आ जाते हैं।।
यमलार्जुन वृक्षों के पूर्व जन्म का वृतांत -:
शुुकदेव मुनि ने जब इस प्रकार यमुनार्जुन वृक्षों की मुक्ति की कथा राजा परीक्षित को सुनाई, तो राजा परीक्षित हाथ जोड़कर के कहने लगे, भगवान अब आप कृपा करके मुझे बताइए कि यह जो यमुनार्जून अशोक के वृक्ष थे उनको दिव्य रूप किस कारण से प्राप्त हुआ? उन्होंने ऐसा कौन सा सद्कर्म किया था जो दिव्य रूप धारण करके श्री धाम की यात्रा की।जब राजा परीक्षित ने इस प्रकार का प्र्र्श्र्र्शन शुुकदेव मुनि से किया तो शुुकदेव मुनि प्रसन्न होकर कहने लगे, सुनो राजन पूर्व काल में ये दोनों अशोक के वृक्ष कुबेर के दो पुत्र थे जिसमें एक का नाम था नल कुुबर व दूसरे का नाम था मणि ग्र्री्र्रीव यह दोनों ही भाई अपने पिता के वैभव पर बहुत मतवाले होकर घमंड में रहते थे। एक समय दोनों भाई यमुना में स्नान कर रहे थे उधर से देव ऋषि नारद का आगमन हुआ देव श्री नारद को आया हुआ देखकर के जमुना में स्नान करने वाले अन्य लोगों ने नारद जी को प्रणाम किया। लेकिन ये दोनों भाई प्रणाम करना तो दूर रहा उनको देखकर के मुंह बनाकर के हंसने लगे, क्योंकि इनको अपने पिता के वैभव पर बहुत घमंड था। जब देव ऋषि नारद ने उन दोनों का इस प्रकार का आचरण देखा तो देव ऋषि को क्रोध आया और उनके इस अभिमान को दूर करने के लिए उन्होंने उन दोनों भाइयों को श्राप दिया कि अरे अभिमानीीीयोो तुम्हें अपने पिता के वैभव पर बहुत अभिमान है जिसके चलते तुम सज्जन पुरुषों का आदर सत्कार भी भूल गए हो अतः मैं तुम्हें श्राप देता हूं तुम्हारी बुद्धि इस समय एक जड़ वृक्ष के समान है अतः जाओ तुम तत्काल प्रभाव से वृक्ष बन जाओ तब नारद ने उन दोनों को ऐसा श्राप दिया तो उनको बहुत पश्चाताप हुआ और वे दोनों नाादर जी के चरणों में गिरकर के प्रणाम करने लगे और क्षमा प्रार्थना करने लगे। तब नारद जी ने कहा देखो द्वापर युग में जब भगवान विष्णु गोकुल में कृष्ण के रूप में अवतार लेंगे, उस समय स्वयं प्रभु श्री कृष्ण तुम्हारा उद्धार करेंगे। ऐसा उपाय बता कर के देव ऋषि नारद वहां से चले जाते हैं। और वे दोनों यमुना के तट पर अशोक के वृक्ष बन गए। और आज उन दोनों कुबेर पुत्र नल कुुबर व मनी गिव दोनों का उद्धार भगवान श्री कृष्ण ने किया।।
।। जय श्री राधे कृष्णा।।
आचार्य श्री कोशल कुमार शास्त्री
9414657245
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