नल दमयंती कथा भाग प्रथम में हमने पढ़ा की किस प्रकार नल और दमयंती का विवाह संपन्न होता है। और इसके आगे की कथा को हम आज की चर्चा में जानेंगे।
कलियुग का प्रभाव, जुए में नल का हारना और नगर से निर्वासन -:
महर्षि बृहदश्व कहते हैं- युधिष्ठिर जिस समय दमयंती के स्वयंबर से लौटकर इंद्र आदि लोकपाल अपने अपने लोको में जा रहे थे। उस समय उनके मार्ग में ही कलयुग और द्वापर से भेंट हो गई ।इन्द्र ने पूछा क्यों कलयुग कहां जा रहे हो? कलयुग ने कहा मैं दमयंती के स्वयंवर में उससे विवाह करने के लिए जा रहा हूं। इंद्र ने हंसकर कहा वह स्वयंबर तो कभी का पूरा हो गया। दमयंती ने राजा नल को वरण कर लिया। हम लोग ताकते ही रह गए। कलयुग ने क्रोध में भरकर कहा अरे! अब तो बड़ा अनर्थ हुआ है। उसने देवताओं की अपेक्षा करके मनुष्य को अपनाया है। इसलिए उसको दंड देना चाहिए। देवताओं ने कहा दमयंती ने हमारी आज्ञा प्राप्त करके नल का वरन किया है। वास्तव में नल सर्वगुण संपन्न और उसके योग्य हैं। वह समस्त धर्मों के मर्मज्ञ और सदाचारी हैं। उन्होंने इतिहास पुराणों के सहित वेदों का अध्ययन के अनुसार यज्ञ में देवताओं को तृप्त करते हैं। कभी किसी को सताते नहीं, सत्य निष्ठा और उनकी चतुरता, धैर्य, ज्ञान तपस्या, पवित्रता दम और शम लोकपाल के समान हैं। उनको श्राप देना तो नरक की आग में गिरना है। यह कहकर देवता लोग चले गए।
अब कलयुग ने द्वापर से कहा - भाई मै अपने क्रोध को शांत नहीं कर सकता। इसलिए मैं नल के शरीर में निवास करूंगा। मैं उसे राज्य से अलग कर दूंगा। तब वह दमयंती के साथ नहीं रह सकेगा। इसलिए तुम भी जुए के पासो में प्रवेश करके मेरी सहायता करना। द्वापर ने उसकी की बात स्वीकार कर ली। द्वापर और कलयुग दोनों ही नल की राजधानी में आ बसे।बारह वर्षों तक इस प्रकार प्रतिक्षा में रहे कि नल में कोई दोष दिख जाए। एक दिन राजा नल संध्या के समय लघुशंका से निवृत्त होकर पैर धौये बिना ही आचमन करके संध्या वंदन करने बैठ गए। यह अपवित्र अवस्था देखकर कलयुग उसके शरीर में प्रवेश कर गया। साथ ही दूसरा रूप धारण करके पुष्कर के पास के पास गया और बोला - तुम नल के साथ जुआ खेलो और मेरी सहायता से जुए में राजा नल को जीतकर देश का राज्य प्राप्त कर लो। पुष्कर उसकी बात स्वीकार कर के नल के पास गया। द्वापर भी पासो का रूप धारण करके उसके साथ हो लिया। जब पुष्कर ने राजा नल से बार-बार जुआ खेलने का आग्रह किया। तब राजा नल दमयंती के सामने अपने भाई की बार-बार की ललकार को सह न सका। उन्होंने उसी समय पासे खेलने का निश्चय कर लिया। उस समय नल के शरीर में कलयुग घुसा हुआ था। इसलिए राजा नल दांव में सोना, चांदी, रथ, वाहन,आदि जो कुछ लगाते वह हार जाते। प्रजा और मंत्रियों ने बड़ी व्याकुलता के साथ राजा नल से मिलकर जुआ को रोकना चाहा और आकर दरवाजे के सामने आकर खड़े हो गए। उनका अभि प्राय जानकर द्वारपाल रानी दमयंती के पास गया और बोला कि आप महाराज से निवेदन कीजिए आप धर्म और अर्थ के तत्वज्ञ है। आपकी सारी प्रजा आपका दुख सहा न होने के कारण कार्यवश दरवाजे पर आकर खड़ी हुई है।
दमयंती स्वयं दुःख के मारे दुर्बल और अचेत हुई जा रही थी। उसने आंखों में आंसू भर गदगद कंठ से महाराज के सामने निवेदन किया। स्वामिन! नगर की राज भक्तों प्रजा और मंत्रिमंडल के लोग आपसे मिलने आए हैं। और दरवाजे पर खड़े हैं। आप उनसे मिल लिजिए परंतु नल कलयुग का आवेश होने कारण कुछ भी नहीं बोले। मंत्रिमंडल और प्रजा के लोग शोक ग्रस्त होकर लौट गए। पुष्कर और नल में कई महीनों तक जुआ होता रहा तथा राजा नल बराबर हारते गए। राजा नल जुए में जो पासे फेंकते वे बराबर ही उनके प्रति कुल पड़ते। सारा धन हाथ से निकल गया।
जब दमयंती को इस बात का पता चला तब उसने बृहद्सेना नाम की धायी के द्वारा राजा नल के सारथी वार्ष्णेय को बुलाया और उससे कहा सारथी तुम राजा के प्रेम पात्र हो अब यह बात उन से छिपी नहीं है। कि महाराज बड़े संकट में पड़ गए हैं। इसलिए तुम घोड़ों को रथ में जोड़ लो और मेरे दोनों बच्चों को रथ में बैठा कर कुंडिननगर में ले जाओ। तुम रथ और घोड़ों को भी वहीं छोड़ देना। तुम्हारी इच्छा हो तो तुम भी वही रहना नहीं तो कहीं दूसरी जगह चले जाना। सारथी ने दमयंती के वचना अनुसार मंत्रियों से सलाह करके बच्चों को कुंडलपुर में पहुंचा दिया। रथ और घोड़े भी वहीं छोड़ दीए तथा स्वयं वहां से पैदल चलकर अयोध्या जा पहुंचा और वही राजा ऋतुपर्ण के पास सारथी का काम करने लगा।
वार्ष्णेय सारथी के चले जाने के बाद पुष्कर ने पासो के खेल में राजा नल का राज्य और धन ले लिया। उसने नल को संबोधन करते हंसते हंसते हुए कहा और जुआ खेलोगे परंतु तुम्हारे पास दांव पर लगाने के लिए तो कुछ है ही नहीं, यदि तुम दमयंती को दांव पर लगाने के योग्य समझो तो फिर खेलते रहो। नलका हदय पटने लगा। पुष्कर से कुछ भी नहीं बोले उन्होंने अपने शरीर से सब वस्त्र आभूषण उतार दीये और केवल एक वस्त्र पहने हुए नगर से बाहर निकले दमयंती ने भी केवल एक साड़ी पहनकर अपने पति का अनुगमन किया। नल के मित्रों और सहयोगियों को बड़ा शौक हुआ। नल और दमयंती नगर के बाहर तीन रात और तीन दिन तक रहे। पुष्कर ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो मनुष्य नल के प्रति सहानुभूति प्रकट करेगा उसको फांसी की सजा दी जाएगी। भय के मारे नगर के लोग अपने राजा नल का सत्कार तक ना कर सके।
राजा नल तीन दिन रात तक अपने नगर के पास केवल पानी पीकर रहे। उन्हें बड़ी भूख लगी फिर दोनों फल खाकर वहां से आगे बढ़े। एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत से पक्षी उनके पास ही बैठे हैं। उनके पंख सोने के समान दमक रहे हैं। नल ने सोचा कि इनकी पंखों से कुछ धन मिलेगा। ऐसा सोच कर उन्हें पकड़ने के लिए उन पर अपना पहनने का वस्त्र डाल दिया। पक्षी उनका वस्त्र लेकर उड़ गए। अब नंगे होकर बड़ी ही दिनता के साथ नीचे मुंह करके खड़े हो गए। पक्षियों ने कहा दुर्बुद्धे! तु नगर से एक वस्त्र पहन कर निकला था। उसे देखकर हमें बड़ा दुख हुआ था। ले अब हम तेरे शरीर पर का वस्त्र लिए जा रहे हैं। हम पक्षी नहीं जुआ के पासे है। नल ने दमयंतीको पासो की बात कह दी।
इसके बाद नल ने कहा प्रिये! तुम देख रही हो यहां बहुत से मार्ग है। एक अवंती की ओर जाता है। दूसरा ऋक्ष वान पर्वत होकर दक्षिण देश को जाता है। सामने विंध्याचल पर्वत है। यह पयो श्रनि नदी समुद्र में मिलती है। ये महर्षियों के आश्रम है। सामने का रास्ता विदर्भ देश को जाता ह यह कौशल देश का मार्ग है। इस प्रकार राजा नल दुख और शोक से भरकर बड़ी सावधानी के साथ दमयंती को भिन्न-भिन्न मार्ग और आश्रम बताने लगे। दमयंती की आंखें आंसू से भर गई। वह गदगद स्वर से कहने लगी। स्वामी आप क्या सोच रहे हैं। मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं। और मेरा हृदय उद्विग्न हो रहा है। आपका राज्य गया। धन गया, आपके शरीर पर वस्त्र नहीं रहा, आप थके मांदे तथा भूखे प्यासे हैं। क्या मैं आपको इस निर्जन वन में छोड़ कर अकेले कहीं चली जा सकती हूं। मैं आपके साथ रहकर आपके दुख दूर करूंगी। दुख के अवसर पर पत्नी पुरुष के लिए औषध है। वह धैर्य देकर पति के दुःख को कम करती है। यह बात वैद्य भी स्वीकार करते हैं। नल ने कहा कि तुम्हारा कहना ठीक है। पत्नी मित्र है। पत्नी औषध है। परंतु मैं तो तुम्हारा त्याग करना नहीं चाहता। तुम ऐसा संदेह क्यों कर रही हो। दमयंती बोली आप मुझे छोड़ना नहीं चाहते परंतु विदर्भ देश का मार्ग क्यों बतला रहे हैं। मुझे निश्चय है कि आप मेरा त्याग नहीं कर रहे हैं। फिर भी इस समय आपका मन उल्टा हो गया है। इसलिए ऐसी शंका करती हूं। आपके मार्ग बताने से मेरा मन दुखता है। यदि आप मुझे मेरे पिता या किसी संबंधी के घर भेजना चाहते हो तो ठीक है। हम दोनों साथ-साथ चलें, मेरे पिता आप का सत्कार करेंगे। आप वही सुख से रहिएगा। नल ने कहा प्रिय तुम्हारे पिता राजा हैं और मैं भी कभी राजा था। इस समय में संकट में पड़ कर उनके पास नहीं जाऊंगा। राजा नल दमयंती को समझाने लगे। तदन्तर दोनों एक ही वस्त्र से शरीर ढककर वन में इधर-उधर घूमते रहे। भूख प्यास से व्याकुल होकर दोनों एक धर्मशाला में आए और ठहर गए।।
जानेंगे शेष कथा भाग ३ में
आचार्य श्री कौशल कुमार शास्त्री
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