आज की कथा प्रसंग में हम जानेंगे रानी दमयंती द्वारा राजा नल की खोज व नल का मिलना।
राजा नल की खोज व कलयुग का उतरना -:
मुनि बृहदश्वजी कहते हैं हे युधिष्ठिर! अपने पिता के घर एक दिन विश्राम करके दमयंती ने अपनी माता से कहा कि माता जी मैं आपसे सत्य कहती हूं यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती है ।तो मेरे पति को ढूंढने का उपाय कीजिए।रानी ने बहुत दुखित हो कर अपने पति राजा भीम से कहा कि स्वामी! दमयंती अपने पति के लिए बहुत व्याकुल है। उसने संकोच छोड़कर मुझसे कहा है कि उन्हें खोजने का उपयोग करना चाहिए। राजा ने अपने आश्रित ब्राह्मणों को बुलवाया और नलको की खोज के लिए उन्हें नियुक्त कर दिया। ब्राह्मणों ने दमयंती के पास जाकर का कि अब हम राजा नल का पता लगाने के लिए जा रहे हैं। दमयंती ने ब्राह्मणों से कहा कि आप लोग जिस राज्य में जाएं वहां मनुष्य की भीड़ में यह बात कहना, मेरे प्यारे छलीया तूम मेरी साड़ी में से आधी फाड़कर तथा मुझ दासी को वन में सोती छोड़कर कहां चले गए। तुम्हारी वह दासी अभी उसी अवस्था में आधे साड़ी पहने तुम्हारे आने के बाठ जो रही है। और तुम्हारे वियोग के दुख से दुखी हो रही है। उनके सामने मेरी दशा का वर्णन कीजिएगा और ऐसी बात कहेगा कि जिस से भी प्रसन्न हो और मुझ पर कृपा करें। मेरी बात करने पर यदि आप लोगों को कोई उत्तर दे दे तो वह कौन ?है कहां रहता है? इन बातों का पता लगा लीजिएगा। उनका उत्तर याद रख कर मुझे सुनाइए गा इस बात का भी ध्यान रखिएगा कि आप लोग यह बात मेरी आज्ञा से कर रहे हैं। यह उसे मालूम ना होवे।
बहुत दिनों तक ढूंढने खोजने के बाद प्रणब नामक ब्राह्मण ने महल में आकर दमयंती से कहा राजकुमारी? मैं आपके कहने के अनुसार निषद नरेश नल का पता लगा हुआ अयोध्या जा पहुंचा। वहां मैंने राजा रितु पर्ण के पास जाकर भरी सभा में तुम्हारी बात दोहराई वहां किसी ने कुछ उत्तर नहीं दिया। जब मैं चलने लगा तब उसके बाहुक नामके सारथी ने मुझे एकांकान्त पर बुलाकर कहा,। देवी! बाहुक सारती राजा रितुपर्ण के घोड़ों को शिक्षा देता था। स्वादिष्ट भोजन बनाता है। परंतु उसके हाथ छोटे और शरीर कुरुप है। उसने लंबी सांस लेकर रोते हुए कहा कि कुलीन स्त्रियां कष्ट पाकरभीअपने शील की रक्षा करती है। और अपने सतीत्व के बल पर स्वर्ग जीत लेती है। कभी उनका पति त्याग भी दे तो विरोध नहीं करती अपने सदाचार की रक्षा करती है। त्यागने वाला विपत्ति में पड़ने के कारण दुखी हो रहा था। इसलिए उस पर क्रोध करना उचित नहीं, माना कि पति ने अपनी पत्नी का योग्य सत्कार नहीं किया। परंतु राज्य लक्ष्मी से दुखी और दुर्दशा ग्रस्त था। ऐसी अवस्था में उस पर क्रोध करना उचित नहीं है। जब वह अपने प्राण की रक्षा के लिए जीविका चाह रहा था। तब पक्षी उसके वस्त्र ले कर उठ गए। उसके हृदय की पीड़ा असहाय थी। राजकुमारी बाहुक की यह आवाज सुनाने के लिए आया हूं। तुम जैसा उचित समझो करो। चाहो तो महाराज से भी कह दो। ब्राह्मण की बात सुनकर दमयंतकी आंखों में आंसू भर आए।
उसने अपनी मां से एकांत में कहा माताजी! आप यह बात पिताजी से ना कहे। मैं सदैव ब्राह्मण को इस काम में नियुक्त करती हूं। जैसे सुदेव ने मुझे शुभ मुहूर्त में यहां पहुंचाया था। वैसे ही वह शुभ शगुन देखकर अयोध्या जाए और मेरे पति देव को लाने की युक्ति करे। इसके बाद दमयंती ने प्रणाद का सत्कार करके उसे विदा किया, और सुदेव को बुलाया। दमयंतीने सुदेव से कहा ब्राह्मण देवता आप! शीघ्र से शीघ्र अयोध्या नगरी में जाकर राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहना,कि भीम पुत्री दमयंती फिर से स्वयंबर स्वेच्छा अनुसार पति वरण करना चाहती है। बड़े-बड़े राजा और राजकुमार आ रहे हैं
स्वयंवर की तिथि कल यही है। इसलिए यदि आप हो सके तो आ जाइए। नल के जीने अथवा मरने किसी को पता नहीं,। इसलिए वह कल सूर्योदय के समय दूसरा पति वरण करेगी। दमयंती की बात सुनकर सुदेश अयोध्या गए और उन्होंने राजाऋतुपर्ण को सारी बात बता दी।
राजा ऋतु पर्ण ने सुदेव ब्राह्मण की बात सुनकर बाहुक को बुलाया और मधुर वाणी से समझा कर कहा, की बाहुक कल दमयंती का स्वयंवर है। मै एक ही दिन में विदर्भ पहुंचना चाहता हूं। यदि तुम इतना जल्दी वहां पहुंच जाना संभव समझो तो मैं वहां जाऊंगा। रितुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा। उन्होंने अपने मन में सोचा, की दमयंती ने दुखी होकर ही ऐसा कहा होगा। संभव है वह ऐसा करना चाहती हो परंतु नहीं नहीं उसने मेरी प्राप्ति के लिए ही यह युक्ति की होगी। वह पतिव्रता तपस्विनी और दीन है। मैंने दुर्बुद्धि बस उसे त्याग कर बड़ी क्रूरता की है। अपराध मेरा ही है। वह कभी ऐसा नहीं कर सकती। अस्तु सत्य क्या है यह बात तो वहां जाने पर ही मालूम होगी।परंतु रितुपर्ण की इच्छा पूरी करने में मेरा भी स्वार्थ है। बाहुक ने हाथ जोड़कर कहा, मैं आपके कथन के अनुसार काम करने की प्रतिज्ञा करता हूं। बाहुक यज्ञशाला में जाकर श्रेष्ठ घोड़ों की परीक्षा करने लगे। नल ने अपनी जाति के चार शीघ्र गामी घोड़े रथ में जोत लीये। राजा रितु पर्ण रथ पर सवार हो गए।
जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं। वैसे ही बाहुक का रथ व घोड़े थोडे ही समय में नदी पर्वत और वनों को लांघने लगे। एक ही स्थान पर राजा ऋतु पर्ण का दुपट्टा गिर गया। उन्होंने बाहुक से कहा, रथ रोको? मैं वाष्र्णेय से उसे उठवा मंगाऊं। नल ने कहा आप का वस्त्र गिरा तो अभी है। परंतु अब हम वहां से एक योजना आगे निकला आए है। वह नहीं उठाया जा सकता। जिस समय यह बात हो रही थी। उस समय रथ एक वन में चल रहा था। कि ऋतुपर्ण ने कहा बाहुक! तुम मेरी गणित विद्या की चतुराई देखो। सामने के वृक्ष में जितने पत्ते और फल देख रहे हैं उनकी अपेक्षा भूमि पर गिरे हुए फल और पत्ते 101 गुने अधिक है।वृक्ष की दोनों शाखाओं और टहनियों पर पांच करोड़ पत्तेहै। और 2095 फल है। तुम्हारी इच्छा हो तो गिनलो।बाहुक रथ खड़ा कर दिया और कहा कि मैं इस ऐड के वृक्ष को काटकर के फलों और पत्तों को ठीक-ठीक गिनकर निश्चय करूंगा। बाहुक ने वैसा ही किया।परंतु फल और पत्ते उतने ही हुए, जितने राजा ने बतलाए थे।बाहुक ने कहा आपकी विद्या अद्भत है। आप अपनी विद्या बतला दीजिए। रितुपर्ण ने कहा कि गणित विद्या कि तरह मैं पासो की वशीकरण विद्या में भी ऐसा ही निपुण हूं।बाहुक ने कहा कि आप मुझे यह विद्या सिखा दे तो मैं आपको घोड़ों की विद्या सिखा दूं।रितु प्रण को विदर्भ देश पहुंचने की बहुत जल्दी थी और अश्व विद्या सीखने का लोभ भी था। इसलिए उन्होंने राजा नल को पासो की विद्या सिखा दी, और कह दिया की अश्वविद्या तू मुझे पीछे सिखा देना। मैंने उसे तुम्हारे पास धरोवर छोड़ दिया।
जिस समय राजा नल ने पशुओं की विद्या सीखी, उसी समय कलयुग ककोटक नाग के तीखे विष को उगलता हुआ नल के शरीर से बाहर निकल गया। कलयुग के बाहर निकलने पर नल को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उसे श्राप देना चाहा, कलयुग दोनों हाथ जोड़कर भय से कांप कर भाग कहने लगा, आप क्रोध शांत कीजिए, मैं आपको यशस्वी बनाऊंगा।आपने जिस समय दमयंती का त्याग किया था। उसी समय उसने मुझे श्राप दे दिया था। मैं बड़े दुख के साथ ककोटक नाग के विष से जलता हुआ आपके शरीर में रहता था। मैं आपकी शरण में हूं। मेरी प्रार्थना सुनो और मुझे श्राप न दे, जो आपके पवित्र चरित्र का गान करेंगे। उन्हें मेरा भय नहीं होगा। राजा नल का क्रोध शांत हुआ। कलयुग भयभीत होकर पेड़ में घुस गया। यह संवाद कलियुग और नल के अतिरिक्त और किसी को मालूम नहीं हुआ।
इस प्रकार कलयुग ने राजा नल का पीछा छोड़ दिया, परंतु अभी उनका रूप नहीं बदला था। उन्होंने अपने रथ को जोर से हांका और सांयकाल होते होते वे विदर्भ देश में पहुंच गए।राजा भीम के पास समाचार भेजा गया। उन्होंने रितु प्रण को अपने यहां बुला लिया। रितु प्रण के रथ की झंकार से दिशाएं गूंज उठी। कुंदन नगर में राजा नल के वे घोड़े भी रहते थे। जो उनके बच्चों को लेकर आए थे। रथ की गड़गड़ाहट से उन्होंने राजा नल को पहचान लिया और वे पूर्ववत प्रसन्न हो गए। दमयंती को भी आवाज वैसे ही जान पड़ी।दमयंती कहने लगी कि इस रथ की गड़गड़ाहट में मेरे चित में उल्लास पैदा करती है। अवश्य ही इसको हांकने वाले मेरे पतिदेव है। यदि आज वे मेरे पास नहीं आएंगे तो मैं धधकती आग में कूद पड़ुंगी। मैंने कभी हंसी खेल में भी उनसे झूठी बात कही हो, उनका कोई अपकार किया हो, प्रतिज्ञा करके छोड़ दी हो, ऐसी याद नहीं आती है। वे शक्तिशाली, क्षमाशील, दान दाता, वीर और एक पत्नीव्रती है। उनके वियोग से मेरी छाती फट रही है। दमयंती महल की छत पर आकर रथ का आना रथी, सारथी का उतरना देखने लगी।
शेष कथा भाग - 6 में
आचार्य श्री कौशल कुमार शास्त्री
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