दमयंती के द्वारा राजा नल की परीक्षा, नल दमयंती मिलन व राज्य प्राप्ति -
बृहदश्वजी कहते हैं हे युधिष्ठिर! विदर्भ नरेश भीम ने अयोध्यापति रितुपर्ण का खूब स्वागत सत्कार किया। रितु पर्ण को अच्छे स्थान में ठहरा दिया गया। उन्हें कुंडलपुर में स्वयंवर का कोई चिह्न नहीं दिखाई दिया। भीम को इस बात का बिल्कुल पता नहीं था कि राजा ऋतु पर मेरी पुत्री के स्वयंबर का निमंत्रण पाकर या आए हैं। उन्होंने कुशल मंगल के बाद पूछा कि आप यहां किस उद्देश्य से पधारे हैं?कि ऋतुपर्ण ने स्वयंम्बर की कोई तैयारी न देकर निमंत्रण की बात दबा दी और कहा मैं तो केवल आपको प्रणाम करने के लिए चलाया हूं ।भीम सोचने लगे कि सौयोजन से भी अधिक दूर कोई प्रणाम करने के लिए नहीं आ सकता। अस्तुआगे चलकर यह बात खुली ही जाएगी। भीम ने बड़े सत्कार के साथ आग्रह करके रितुपर्ण अपने यहां रख लिया बाहुक भी वाष्र्णेय के साथ अश्वशाला में ठहर कर घोड़ों की सेवा में संलग्न हो गया।
दमयंती आकुल होकर सोचने लगी कि रथ की ध्वनि तो मेरे पतिदेव के रथ के समान जान पड़ी थी। परंतु उनके कहीं दर्शन नहीं हो रहे हैं। हो न हो वार्ष्णेय ने उनसे रथ विद्या सीख ली होगी इसी कारण रथ उनका मालूम पड़ता था। संभव है कि ऋतुपर्ण को भी यह विद्या मालूम हो। उसने अपनी दासी को बुलाकर कहा कि कैशनी! तू जा इस बात का पता लगा कि वह कुरूप पुरुष कौन है? संभव है यही हमारे पतिदेव है। ब्राह्मणों के द्वारा जो संदेश भेजा था। वही उसे बतलाना और उसका उत्तर सुनकर मुझसे कहना। कैशनी ने जाकर बाहुक से बातें की, बाहुक ने राजा के आने का कारण बताया। संक्षेप में वाष्र्णेय तथा अपने अश्वविद्या, भोजन बनाने की क्षमता का परिचय दिया।कैशनी ने पुछा बाहुक! राजा नल कहा है? क्या तुम जानते हो? बाहुक ने कहा वाष्र्णेय राजा नल के बच्चों को छोड़कर चला गया था। उसे उनके सम्बन्ध कुछ भी मालूम नहीं है। इस समय नल का रुप बदल गया है।वे छुप कर रहते हैं। उन्हें या तो स्वयं वे ही पहचान सकते हैं, या उनकी पत्नी दमयंती।क्योंकि वह अपने गुप्त चिन्हों को दूसरों के सामने प्रकट करना नहीं चाहते। कैशनी राजा नल विपत्ति में पड़ गए थे। इसी से उन्होंने अपनी पत्नी का त्याग किया। दमयंती को अपने पति पर क्रोध नहीं करना चाहिए जिस समय में भोजन की चिंता में थे, पक्षी उनके वस्त्र ले कर उठ गए। उनका हृदय पीड़ा से दुखी हो रहा था। यह ठीक है कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ उचित व्यवहार नहीं किया। फिर भी दमयंती को उनकी दूरावस्था पर विचार करके क्रोध नहीं करना चाहिए। यह कहते नल का हदय खिन्न हो गया, आंखों में आंसू आ गए, रोने लगे। केशनी ने दमयंती के पास आकर वहां की सब बातचीत और उनका रोना भी बतलाया।।
अब दमयंती की आशंका और दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल है। उसने दासी को कहा कि केसरनी! तुम फिर बाहुक के पास जाओ, उनके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो, उनकी चेष्टाओ पर ध्यान दो, वह आग मांगे तो मत देना, जल मांगे तो देर कर देना, उसका एक एक चरित्र मुझे आकर बताओ। कैशनी फिर बाहुक के पास गई और वहां उसके देवता ओ और मनुष्य के समान बहुत से चरित्र देखकर लौट आई। दमयंती से कहने लगी राजकुमारी! बाहुक ने तो जल थल और अग्नि पर सब तरह से विजय प्राप्त कर ली है। मैंने आज तक ऐसा पुरुष ना कहीं देखा वह नहीं सुना है। यदि कहीं नीचा द्वार आ जाता है तो झुकता नहीं उसे देखकर दवार ही ऊंचा हो जाता है। वह बिना झुके ही चला जाता है। छोटे से छोटा छैद भी उसके लिए गुफा बन जाता है। वहां जल के लिए जो घडे रखें थे उसकी दृष्टि पड़ते ही जल्द से भर गए। उसने फूस का पुला लेकर सूर्य की ओर किया और वह जलने लगा। पानी उसकी इच्छा के अनुसार बहता है। वह जब अपने हाथों से फूलों को मसल नहीं लगता है।तब वे कुम्हल ते नहीं हैं। तथा सुगंधीत देखते हैं। इन अद्भुत लक्षणों को देखकर मैं भी आश्च्र चकित सी रह गई और बड़ी शीघ्रता से तुम्हारे पास चली आई। दमयंती बाहुक के कर्म और चेस्टाओ को सुनकर निश्चित रूप से जान गई कि यहीं अवश्य ही मेरे पतिदेव है। उसने केशनी के साथ अपने दोनों बच्चों को नल के पास भेज दिया। बाहुक इंद्रसेना और इंद्रसेन को पहचान कर उनके पास आ गया और दोनों बालकों को छाती से लगाकर गोद में बैठा लिया, बाहुक अपनी संतानों से मिलकर घबरा गया और रोने लगा उसके मुख पर पिता के समान स्नेह के भाव प्रकट होने लगे। तदन्तर बाहुक ने दोनों बच्चों केशनी को दे दीए और कहा ये बच्चे मेरे दोनों बच्चों के समान है। इसलिए मैं इन्हें देकर रोपड़ा, केशनी! तुम बार-बार मेरे पास आती हो लोग न जाने क्या सोचने लगेंगे, इसलिए मेरे पास बार-बार आना उत्तम नहीं है। तुम जाओ केशनी ने दमयंती के पास आकर वहां की सारी बातें कह दी।
अब दमयंती ने कैशनी को अपनी माता के पास भेजा और कहलाया की माता जी मैंने राजा नल समझ कर बार-बार बाहुक की परीक्षा करवाई, अब मुझे केवल उनके रूप ही संदेश रह गया और मैं स्वयं इनकी परीक्षा करना चाहती हूं ।इसलिए आप बाहुक को मेरे महल में आने की आज्ञा दे दीजिए अथवा उनके पास ही जाने की आज्ञा दे दीजिए। आपकी इच्छा हो तो यह सब बात पिताजी को बतला दीजिए अथवा मत बतलाइए ।रानी ने अपने पति से अनुमति ली और बाहुक को निवास में बुलवाने कीआज्ञा दी। बाहुक को बुला लिया गया। दमयंती के देखते ही नलका हदय एक साथ ही सुख और दुख से भर गया। वे आंसूओं सें नहा गए। बाहुक की आकुलता देखकर दमयंती भी शौक ग्रस्त हो गई। उस समय दमयंती भगवा वस्त्र पहने हुए थी केसों की जटा बंधी हुई थी। शरीर मरीन था। दमयंती ने कहा बाहुक! पहले एक धर्मज्ञ पुरुष अपनी पत्नी को वन में सोती छोड़कर चला गया था। क्या कहीं तुमने उसे देखा है? उस समय वह स्त्री थकी मांदी थी। नींद से अचेत थी। ऐसी निरपराध स्त्री को निषद नरेश के सिवा और कौन पुरुष निर्जन वन में छोड़ सकता है। मैंने जीवन भर में जानबूझकर उनका कोई भी अपराध नहीं किया, फिर भी वह मुझे वन में सोती छोड़ कर चले गए। इतना कहते-कहते दमयंती के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। दमयंती के विशाल नेत्रों से आंसू टपकते देखकर नल से रहा न गया। वे कहने लगे प्रिय! मैंने जानबूझकर ना तो राज्य का नाश किया और ना तुम तुम्हें त्यागा है। यह तो कलयुग का करतूत है। मैं जानता हूं कि जब से तुम मुझ से बिछड़ी हूं तब से रात दिन मेरा ही स्मरण चिंतन करती रहती हो। कलयुग मेरे शरीर में रहकर तुम्हारे श्राप के कारण जलता रहता था। मैंने उद्योग और तपस्या के बल से उस पर विजय पा ली और अब हमारे दुख का अंत आ गया। कलयुग मुझे छोड़कर चला गया। मैं एकमात्र तुम्हारे लिए ही आया हूं। यह तो बताओ कि तुम मेरे जैसे प्रेमी और अनुकूल पति को छोड़कर जिस प्रकार दूसरे पति से विवाह करने के लिए तैयार हुई हो क्या,कोई दूसरी स्त्री ऐसा कर सकती है ?तुम्हारे स्वयंबर का समाचार सुनकर ही तो राजा ऋतु पर्ण बड़ी शीघ्रता के साथ यहां आए हैं।
दमयंती ने हाथ जोड़कर कहा आर्यपुत्र! मुझ पर दोष लगाना उचित नहीं है। आप जानते हैं कि मैंने अपने सामने प्रकट देवताओं को छोड़कर आपको वरण किया। मैंने आपको ढूंढने के लिए बहुत से ब्राह्मणों को भेजा था। मेरी कहीं बातें दोहराते हुए चारोऔर घूम रहे थे। पर्णाद नामक ब्राह्मण अयोध्यापुरी में आपके पास भी पहुंचा था। उसने आपको मेरी बातें सुनाई थी और आपने उसका यथोचित उत्तर भी दिया था। वह समाचार सुनकर मैंने आपको बुलाने के लिए युक्ति की है कि मैं जानती हूं कि आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जो एक दिन में घोड़ों के रथ से सोयोजन पहुंच जाए। मैं आपके चरणों में स्पर्श करके शपथ पूर्वक सत्य सत्य कहता हूं, मैंने कभी मन से भी पर उसका चिंता नहीं किया। यदि मैंने कभी मन से भी पाप कर्म किया हो तो निरन्तर भूमि पर चलने वाले वायु देव, भगवान सूर्य और मन के देवता
चंद्रमा मेरे प्राणों का नाश कर दे, यह तीनों देवता सकल भूमंडल में भी विचरते हैं वे सच्ची बात बतला दे और यदि में पापनि हूं तो मुझे त्याग दें। उसी समय वायु ने अंतरिक्ष में स्थित होकर कहा राजन! मैं सत्य कहता हूं कि दमयंत ने कोई पाप नहीं किया। इसने 3 बरस तक अपने उज्जवल शील वृक्ष की रक्षा की, हम लोग इस के रक्षक रूप में रहे और इसकी पवित्रता के साक्षी है। इसकी स्वयंबर की सूचना तो तुम्हे ढूंढने के लिए ही दी थी। वास्तव में दमयंती तुम्हारी योग्य है और तुम दमयंती के योग्य, अतः इसे स्वीकार करो, जिस समय पवन देवता यह बात कह रहे थे। उस समय आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवताओं की दुंदु भिया बजने लगी, शीतल मंद सुगंध वायु चलने लगी ऐ,साअद्भुत दृश्य देखकर राजा नल ने अपना संदेश छोड़ दिया। और नागराज कककोटक का दिया हुआ वस्त्र औड़कर उसका स्मरण किया उसका शरीर तुरंत पूर्व वत हो गया। दमयंती राजा नल को पहले रूप में देखकर उनसे लिपट गई और रोने लगी। राजा ने भी प्रेम के साथ दमयंती को गले लगाया और दोनों बालकों को छाती से लिपटा कर उनके साथ प्यार की बातें करने लगे। सारी रात दमयंती के साथ बातचीत करने में ही बीत गई।
प्रातःकाल होने पर नहा धो सुंदर वस्त्र पहन कर दमयंती और राजा नल भीम के पास गए। उनके चरणों में प्रणाम किया, भीम ने बड़े आनंद से उन का सत्कार किया और आश्वासन दिया। बात की बात में यह समाचार सर्वत्र पहुंच गया। नगर के नर नारी आनंद में भरकर उत्सव मनाने लगे। देवताओं की पूजा हुई। जब राजा रितुपर्ण को यह बात मालूम हुई की बाहुक रूप में तो राजा नहीं थे। यहां वे अपनी पत्नी से मिल गये ।तब उन्हें बहुत आनंद हुआ। उन्होंने नल को अपने पास बुला क्षमा मांगी। राजा नल उनके व्यवहार की प्रशंसा की और उनका सत्कार किया ।साथ ही उनको अश्व विद्या भी सिखा दी। राजा ऋतु पर्ण किसी दूसरे साथी को लेकर अपने नगर चले गए। राजा नल एक महीने तक कुंडीन नगर में ही रहे। तदअंतर अपने ससुर भीम की आज्ञा लेकर थोड़े से लोगों को साथ लेकर निषध देश के लिए रवाना हुए। राजा भीम ने श्वेत वर्ण का रथ 16 हाथी 50 घोड़े और 600 पैदल राजा नल के साथ भेज दिए।अपने नगर में प्रवेश करके पुष्पक से मिले और बोले कि या तो तुम कपट भरे जुए का खेल फिर मुझसे खेलो,या धनुष पर डोरी चढ़ावो, पुष्कर ने हंसकर कहा अच्छी बात है। तुम्हें दांव पर लगाने के लिए फिर धन मिल गया आओ अब की बार तुम्हारे धन और दमयंती को भी जीत लूंगा। नल ने कहा अरे भाई जुआ खेलो बकते क्या हो, हार जाओगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी जानते हो, जुआ होने लगा। राजा नल ने पहले ही जुआ में पुष्कर के राज्य रत्नों के भंडार और उसके प्राणों को भी जीत लिया। उन्होंने पुष्कर से कहा कि अब सब राज्य मेरा हो गया ।अब तुम दमयंती को आंख उठाकर भी नहीं देख सकते। तुम दमयंती के दास हो। अरे मूड! पहली बार भी तुमने मुझे नहीं जीता था। वह काम कलियुग का था। तुम्हें इस बात का पता नहीं है। मैं कल युग के दोष तुम्हारे सिर नहीं मढना चाहता ।तुम अपना जीवन सुख सुख से बिताओ। मैं तुम्हें छोड़ देता हूं। तुम पर मेरा प्रेम पहले के ही समान है। तू मेरे भाई हो, मैं कभी तुम पर अपनी आंख टेडी नहीं करूंगा। तुम सो वर्षों तक जियो,। राजा नल इस प्रकार कहकर पुष्कर को विदा किया और उसे अपने हृदय से लगाकर जी जाने की आज्ञा दी। पुष्कर ने हाथ जोड़कर राजा नल को प्रणाम किया और कहा जगत में आप की अक्षय कीर्ति हो और आप 10000 वर्षों तक सुख से जीवित रहे, आप मेरे अन्नदाता और प्राण दाता है। पुष्कर बड़े सत्कार और सम्मान के साथ एक महीने तक जानल के नगर में ही रहे। तदन्तर सेना और परिवार के साथ अपने नगर में चला गया। राजा नल भी पुष्कर को पहुंचा कर अपनी राजधानी लौट आए ।सभी नागरिक साधारण प्रजा और मंत्रिमंडल के लोग राजा नल को पाकर प्रसन्न हुए। उन्होंने रोमांचित शरीर से हाथ जोड़कर राजा नल से निवेदन किया। राजेंद्र! आप लोग दुख से छुटकारा पाकर सुखी हुए हैं। जैसे देवता इंद्र की सेवा करते हैं वैसे ही आप की सेवा करने के लिए हम सब आए हैं। घर घर आनंद मनाया जाने लगा। चार और शांति फैल गई। बड़े-बड़े उत्सव होने लगे। राजा नल ने सेना भेजकर दमयंती को बुलवाया। राजा भीम ने अपनी पुत्री को बहुत सी वस्ते देखकर ससुराल भेज दिया। दमयंती अपने दोनों संतानों को लेकर महल में आ गई। राजा नल बड़े आनंद के साथ समय बिताने लगे। राजा नल की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। विक्रम बुद्धि से प्रजा का पालन करने लगे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके भगवान की आराधना की।
इस प्रकार बृहदश्वजी कहते हैं। हे युधिष्ठिर! तुम्हें भी थोड़े ही दिनों में तुम्हारा राज और सगे संबंधी मिल जाएंगे। राजा नल ने जुआ खेल कर बड़ा भारी दुख मोल ले लिया। उसे अकेले ही सब दुख भोगना पड़ा परंतु तुम्हारे साथ तो भाई है द्रोपदी है और बड़े-बड़े विद्वान तथा सदाचारी ब्राह्मण ऐसी दशा में शोक करने का तो कोई कारण ही नहीं है। संसार की स्थितियां सर्वदा एक ही नहीं रहती यह विचार करके भी उनकी अभिवृद्धि और हास से चिंता नहीं करनी चाहिए। नागराज ककोटक, दमयंती, नल की कथा कहने सुनने से कलीयुग के पापों का नाश होता है, और दुखी मनुष्य को धैर्य मिलता है।।
।।इति।।
जय श्री राधे राधे
आचार्य श्री कोशल कुमार शास्त्री
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