अष्टक वर्ग का महत्व पार्ट 1

 अष्टक वर्ग का महत्व पार्ट 1 -:

जय श्री राम मित्रों

 ज्योतिष शास्त्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय होता है जिसे अष्टक वर्ग कहा जाता है। कुंडली के फलादेश में अष्टक वर्ग का सर्वाधिक महत्व होता है। गोचर कुंडली अवलोकन अष्टक वर्ग के बिना अपूर्ण होता है। अष्टक वर्ग ज्योतिष शास्त्र का विषय है जो किसी भी जातक के जीवन में घटित होने वाली आगामी घटना को विद डेट और टाइम तक बता सकती है।  अष्टक वर्ग  शोधन  में ज्योतिषी को बहुत ही परिश्रम करना पड़ता है। शायद यही कारण रहा होगा जिस कारण से अष्टक वर्ग पद्धति एक छुपा हुआ विषय बनकर रह गया। किंतु वर्तमान समय में आधुनिक टेक्नोलॉजी में सॉफ्टवेयर की सहायता अष्टक वर्ग के संपूर्ण चार्ट आसानी से उपलब्ध है। अच्छा अष्टक वर्ग की जानकारी प्रत्येक ज्योतिषी को होना चाहिए अन्यथा अष्टक वर्ग के बिना ज्योतिष का फल अपूर्ण ही माना जाएगा। तो आइए जानते हैं कि अष्टक वर्ग पद्धति क्या होती है?
 ग्रहों का विभिन्न राशियों पर विचरण करने से उनका शुभाशुभ फल जातक को प्राप्त होता है। तथा इसे गोचर फल कहा जाता है। सामान्यत  जन्म कालीन चंद्रमा अर्थात जन्म के समय जिस राशि में चंद्रमा विद्यमान होता है उस को आधार बनाकर गोचर फल कहते हैं। जैसे - जन्म कालीन चंद्रमा से गुरु गोचर करता हुआ चतुर्थ भाव या राशि में प्रवेश करता है तो वह समय जातक के लिए अनिष्ट कारी होता है और जैसा कि हम जानते हैं कि गुरु एक राशि में 13 महीने रहते हैं। अतः जब तक बृहस्पति चतुर्थ भाव में रहेंगे। वह समय जातक के लिए अनिष्ट कारी रहेगा। 13 महीने बाद जब बृहस्पति चतुर्थ राशि से पंचम राशि या भाव में   प्रवेश करेंगे तो वह 13 महीने का समय जातक के लिए अच्छा होग। तत्पश्चात 13 महीने बाद जब गुरु पंचम राशि यां भाव को छोड़ कर षष्टम राशि या भाव में प्रवेश करेंगे तो वहां जब तक बृहस्पति 13 महीने तक विचरण करते रहेंगे। वह समय जातक के लिए पुनः अनिष्ट फल दाता हो जाएगा।

इस प्रकार जन्म कालीन ग्रह तो जन्म कुंडली में उसी स्थान पर विद्यमान होते हैं किंतु जिस दिन के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। उस दिन का ग्रहों का मूवमेंट या गोचर देखते हैं कि कौन सा ग्रह  अभी ब्रह्मांड में किस  राशि पर विचरण कर रहा हैं। इसके लिए सामान्यतः हम हमारे जन्म कालीन चंद्रमा अर्थात जन्म राशि को आधार बनाकर के वहां तत्कालीन ग्रहों को बिठाकर  जन्म कालीन राशि या चंद्रमा को लग्न बनाकर गणना करके जातक के तत्काल के शुभ अशुभ फल कहते हैं। किंतु केवल चंद्रमा को आधार मानकर  जातक के गोचर का फल कहना पूर्ण सत्य नहीं हो सकता जैसा कि  मान लीजिए  जन्म कालीन चंद्रमा से बृहस्पति चतुर्थ भाव में अनिष्ट कारी हो रहे हैं। किंतु अन्य ग्रह सूर्य मंगल बुध शुक्र शनि लग्न इत्यादि ग्रहों की हिसाब से बृहस्पति शुभ फल दाता बन रहे हैं तो क्या यहां केवल चंद्रमा से बृहस्पति का अनिष्ट मान करके ही जातक को फल कहना सत्य नहीं हो सकता। इसके लिए हमें अन्य ग्रहों के हिसाब से भी बृहस्पति का गोचर विचार करना होता है। इसे ही अष्टक वर्ग कहा जाता है अर्थात जिस प्रकार से हम चंद्रमा से तत्कालीन गृह का मूवमेंट देखते हैं उसी प्रकार से अन्य ग्रह का भी विचार करते हैं। और इसमें मुख्य रूप से 7 ग्रह व लग्न को महत्त्व दिया गया है। राहु केतु छाया ग्रह होने कारण उनको अष्टक वर्ग में स्थान नहीं मिला है। इसलिए सात ग्रह व लग्न से तत्कालीन ग्रह का गोचर देखना ही अष्टक वर्ग कहलाता है। इस प्रकार इसका नाम अष्टक वर्ग पद्धति सिद्ध होती है। 

इस प्रकार गोचरवश ग्रहों का विभिन्न राशियों में विचरण करना जातक के लिए शुभाशुभ फल की भविष्यवाणी करने में  अष्टक वर्ग  सटीक व पूर्ण  फल करने में सक्षम पद्धति है। अष्टक वर्ग पद्धति से हम जातक के जीवन में होने वाली घटना को डेट और टाइम तक की भविष्यवाणी करने में सफल होते हैं। अतः अष्टक वर्ग के बिना ज्योतिष का ज्ञान अधूरा सा प्रतीत होता है। अष्टक वर्ग ज्योतिष शास्त्र का एक बहुत ही विस्तृत चैप्टर है। इसको हम क्रम से  समझने का प्रयास करेगे। तो आने वाली पोस्ट में हम अष्टक वर्ग बनाना सीखेंगे।


............शेष अगली पोस्ट में जानेंगे अष्टक वर्ग का निर्माण किस प्रकार किया जाता है?


तब तक जय श्री राम!


एस्ट्रोलॉजर्स आचार्य केके शास्त्री
 वैदिक ज्योतिष शोध संस्थान
 चौथ का बरवाड़ा सवाई माधोपुर
 राजस्थान 9414 6572 45

एस्ट्रोलॉजर आचार्य केके शास्त्री




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