भृगु संहिता में द्विवाह योग

 भृगु संहिता में सेकंड मैरिज योग-:

नमस्कार मित्रों। 
आज की चर्चा में हम भृगु संहिता में वर्णित सेकंड मैरिज योग के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। आज की चर्चा में जानेंगे की पत्रिका में सेकंड मैरिज योग किस प्रकार निर्मितहोत है। जैसा कि हम सब जानते हैं। विवाह का विचार विशेषतः सप्तम भाव, उपपद लग्न  शुक्र, दाराकारक तथा नवांश से किया जाता है।
 आईए जानते हैं पत्रिका में सेकंड मैरिज योग किन कारणों  से बनता है।


1. सप्तम भाव से द्वितीय विवाह के संकेत -:


(क) सप्तम भाव पर पाप प्रभाव
यदि सप्तम भाव में शनि, राहु या मंगल स्थित हों
अथवा सप्तम भाव दो या अधिक पाप ग्रहों से दृष्ट हो
 तो प्रथम विवाह में क्लेश, अलगाव या मृत्यु के बाद द्वितीय विवाह की स्थिति बनती है।

“सप्तमे शनिराहुयुक्ते, पुनर्भार्या योगः।”

(ख) सप्तमेश का द्वि-स्वामित्व या द्वि-संबंध
सप्तमेश यदि
द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) में हो
या दो ग्रहों से युति/दृष्ट में हो तो भी 
विवाह मैं प्रॉब्लम्स आते हैं सेकंड मैरिज तक के योग बनते हैं

2 ‌. उपपद लग्न से द्वितीय विवाह -:



बृगु परंपरा में उपपद लग्न अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
(क)  उपपद पर पाप ग्रह या 
 उपपद में शनि / राहु / मंगल हो तो शादी में दिक्कतें रहती है।


(ख) उपपद से 2nd या 8th भाव पीड़ित हो या 
उपपद से द्वितीय भाव पर पाप ग्रह का संबंध हो तो उस कंडीशन में दाम्पत्य जीवन स्थिर नहीं रहता है।

इसी प्रकार उपपद सेअष्टम भाव पर पाप ग्रह हो तो 
 जीवनसाथी का नाश या संबंध विच्छेद होता है।

3. शुक्र (कारक ग्रह) से संकेत -:


(क) शुक्र पीड़ित हो शुक्र यदि शनि / राहु / केतु से युक्त या 6, 8, 12 भाव में स्थित हो तो एक से अधिक विवाह योग बनता है।

(ख) शुक्र + द्विस्वभाव राशि शुक्र मिथुन, कन्या, धनु, मीन में
 एकाधिक वैवाहिक संबंधों की प्रवृत्ति होती है।

4. नवांश (D-9) में द्वितीय विवाह -:


बृगु संहिता नवांश को विवाह का वास्तविक फल मानती है।
यदि नवांश में सप्तम भाव/सप्तमेश पीड़ित हो शुक्र पाप ग्रहों से ग्रस्त हो या नवांश लग्न या सप्तम भाव द्विस्वभाव राशि में
हो तो द्वितीय विवाह निश्चित रूप से होता है।


5. दशा–अंतरदशा में द्वितीय विवाह कब?


द्वितीय विवाह सामान्यतः इन दशाओं में होता है—;

सप्तमेश की दशा/अंतर उपपद स्वामी की दशा शुक्र की दशा
राहु की दशा (विशेषतः यदि राहु सप्तम/उपपद से जुड़ा हो)
बृगु मत में राहु दशा में संबंध परिवर्तन अत्यंत प्रबल माना गया है।


6. स्त्री व पुरुष कुंडली में विशेष भेद -:

पुरुष कुंडली सप्तम भाव + शुक्र प्रधान और स्त्री कुंडली अष्टम भाव, सप्तम भाव, गुरु गुरु यदि निर्बल/पीड़ित विवाह में पुनरावृत्ति करता है।

7. द्वितीय विवाह योग का शमन कब होता है?

यदि—
गुरु बलवान होकर सप्तम भाव/शुक्र पर दृष्टि करे नवांश में शुभ प्रभाव प्रबल हो तो योग होते हुए भी द्वितीय विवाह टल सकता है।

8. बृगु संहिता अनुसार सार निष्कर्ष


“सप्तमभावे पीड़ा, उपपदे भंग, शुक्रे दोषे — पुनर्विवाहः।”


अर्थात
सप्तम भाव पीड़ित होउपपद लग्न से दाम्पत्य टूटे शुक्र निर्बल हो तो इस कंडीशन में  द्वितीय विवाह निश्चित होता है।


आज की चर्चा में इतना ही

जय श्री राम 

एस्ट्रो आचार्य के के शास्त्री
9414657245


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