केमद्रुम दोष का संपूर्ण विवरण -:
. केमद्रुम दोष की परिभाषा -:
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार—
“यदि चन्द्रमा के दोनों ओर (द्वितीय और द्वादश भाव में) कोई ग्रह न हो तथा चन्द्रमा अकेला हो, तब केमद्रुम योग उत्पन्न होता है।
अर्थात् जब चन्द्रमा के 2nd और 12th भाव में कोई भी ग्रह (राहु-केतु सहित) न हो, तथा चन्द्र पर किसी ग्रह की दृष्टि या युति न हो, तो केमद्रुम दोष बनता है।
. बनने की शर्तें -:
चन्द्रमा के द्वितीय (2nd) और द्वादश (12th) भाव रिक्त हों।
चन्द्रमा के साथ कोई ग्रह युति में न हो।
चन्द्रमा पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो।
कुछ मतों में राहु-केतु को भी ग्रह मानकर देखा जाता है।
यदि इन शर्तों में से कोई भी भंग हो जाए तो दोष शिथिल या समाप्त हो जाता है।
केमद्रुम दोष के फल -:
मानसिक स्थिति -
अकेलापन, अवसाद, चंचलता
आर्थिक स्थिति-:
प्रारंभिक जीवन में आर्थिक संघर्ष
सामाजिक जीवन-:
सम्मान में कमी या अस्थिरता
पारिवारिक सुख -:
मातृ सुख में कमी
आत्मविश्वास
उतार-चढ़ाव
यह दोष व्यक्ति को मानसिक रूप से अधिक प्रभावित करता है क्योंकि चन्द्र मन का कारक है।
दोष के भंग -:
केमद्रुम दोष पूर्णत: प्रभावी तभी होता है जब कोई भंग न हो। निम्न स्थितियों में दोष समाप्त या कम हो जाता है:
चन्द्रमा केंद्र (1, 4, 7, 10) में हो।
चन्द्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि हो।
लग्न या चन्द्र से केंद्र में ग्रह हों।
चन्द्रमा उच्च (वृषभ) या स्वगृही (कर्क) हो।
राजयोग या गजकेसरी योग बन रहा हो।
आध्यात्मिक एवं कर्मगत संकेत -:
पूर्व जन्म के मानसिक या पारिवारिक ऋण।
एकांतप्रियता और आत्मविश्लेषण की प्रवृत्ति।
ध्यान, साधना, तंत्र, ज्योतिष में प्रगति की संभावना।
उपाय (शास्त्रोक्त) -:
सोमवार का व्रत।
चन्द्र मंत्र जप —
“ॐ सोम सोमाय नमः” (11 माला प्रतिदिन)
मोती (Pearl) धारण (यदि कुंडली अनुसार शुभ हो)।
गौ-सेवा, दुग्ध दान।
रुद्राभिषेक

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