अंगारक दोष का पत्रिका में प्रभाव -:
राहु–मंगल का अंगारक दोष तब बनता है जब राहु और मंगल एक ही भाव में स्थित हों या बहुत निकट युति में हों। इसे ज्योतिष में उग्र और अशुभ योग माना जाता है क्योंकि
मंगल अग्नि, क्रोध, ऊर्जा और युद्ध का कारक है
राहु भ्रम, अचानक घटनाएँ, अत्यधिक इच्छा और अनियमितता का कारक है
दोनों मिलकर व्यक्ति के जीवन में अचानक संकट, क्रोध, दुर्घटना, विवाद, मानसिक अशांति आदि की प्रवृत्ति बढ़ा सकते हैं।
नीचे १ से १२ भाव तक अंगारक दोष के सामान्य फल दिए जा रहे हैं।
प्रथम भाव (लग्न)
स्वभाव में क्रोध, आवेश और जल्दबाजी
सिर या चेहरे पर चोट या निशान की संभावना
निर्णय जल्द लेने की प्रवृत्ति
नेतृत्व क्षमता भी प्रबल हो सकती है
स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव
द्वितीय भाव
परिवार में विवाद या मतभेद
वाणी कठोर या तीखी
धन आने-जाने में अस्थिरता
खान-पान में अनियमितता
परिवार से दूरी
तृतीय भाव
साहस और पराक्रम बहुत अधिक
भाई-बहनों से मतभेद
जोखिम भरे काम करने की प्रवृत्ति
मीडिया, सेना, पुलिस या तकनीकी क्षेत्र में सफलता
चतुर्थ भाव
घर में अशांति या पारिवारिक तनाव
माता के स्वास्थ्य में परेशानी
भूमि-वाहन से संबंधित विवाद या दुर्घटना
बार-बार स्थान परिवर्तन
पंचम भाव
प्रेम संबंधों में अस्थिरता
संतान से चिंता
पढ़ाई में बाधा या एकाग्रता की कमी
सट्टा या जोखिम भरे निवेश की प्रवृत्ति
षष्ठ भाव
शत्रुओं पर विजय की क्षमता
मुकदमे या विवाद में जीत
रोगों से लड़ने की शक्ति
लेकिन क्रोध से शत्रु भी बढ़ सकते हैं
सप्तम भाव
वैवाहिक जीवन में तनाव
जीवनसाथी के साथ विवाद या अलगाव की संभावना
साझेदारी में नुकसान
विवाह में देरी
अष्टम भाव
अचानक दुर्घटना या ऑपरेशन की संभावना
जीवन में अचानक उतार-चढ़ाव
गुप्त शत्रु
रहस्य, शोध या तंत्र-मंत्र में रुचि
नवम भाव
भाग्य में उतार-चढ़ाव
पिता या गुरु से मतभेद
धर्म में उग्र या अलग विचार
विदेश यात्रा की संभावना
दशम भाव
करियर में अचानक बदलाव
प्रशासन, सेना, इंजीनियरिंग या राजनीति में सफलता
कार्यस्थल पर विवाद
बहुत मेहनत के बाद सफलता
एकादश भाव
धन कमाने की तीव्र इच्छा
मित्रों से मतभेद
अचानक लाभ और अचानक हानि
बड़े नेटवर्क से लाभ
द्वादश भाव
अनावश्यक खर्च
विदेश या दूर स्थान में रहना
मानसिक तनाव या गुप्त शत्रु
आध्यात्मिक झुकाव भी संभव
महत्वपूर्ण बात:
यदि मंगल स्वगृही, उच्च या शुभ दृष्टि में हो तो यह दोष कम होकर ऊर्जा, साहस और सफलता भी दे सकता है।
राहु–मंगल की युति को सामान्यतः अंगारक दोष कहा जाता है, लेकिन हर स्थिति में यह हानिकारक नहीं होता। कुछ विशेष परिस्थितियों में यही योग अत्यधिक शक्ति, साहस और असाधारण सफलता देकर राजयोग जैसा परिणाम दे सकता है।
नीचे 5 ऐसे दुर्लभ योग दिए जा रहे हैं जहाँ अंगारक दोष शुभ परिणाम देने लगता है।
उपचय भाव में अंगारक योग -:
यदि राहु-मंगल 3, 6, 10 या 11 भाव (उपचय भाव) में हों तो
साहस और जोखिम लेने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है
शत्रुओं पर विजय मिलती है
प्रशासन, सेना, पुलिस, राजनीति, इंजीनियरिंग आदि में सफलता
व्यक्ति अपने दम पर बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर सकता है
विशेषकर 10वें या 11वें भाव में यह योग कई बार राजयोग जैसा प्रभाव देता है।
मंगल स्वगृही या उच्च का हो -:
यदि मंगल
मेष या वृश्चिक में (स्वगृही)
मकर में (उच्च)
और उसी के साथ राहु हो, तो मंगल बहुत शक्तिशाली हो जाता है।
फल:
अद्भुत साहस और नेतृत्व क्षमता
बड़ी जिम्मेदारी वाले पद
अचानक बड़ी सफलता
गुरु की शुभ दृष्टि हो -:
यदि इस युति पर बृहस्पति (गुरु) की दृष्टि हो या गुरु मजबूत हो तो
राहु की नकारात्मकता काफी कम हो जाती है
बुद्धिमत्ता और नीति का संतुलन आता है
व्यक्ति शक्ति का सही उपयोग करता है
इससे अंगारक दोष कई बार राजयोग में बदल जाता है।
दशम भाव में मजबूत योग -:
यदि राहु-मंगल दशम भाव में हों और
लग्न मजबूत हो
दशमेश अच्छा हो
तो यह योग व्यक्ति को
प्रशासन
राजनीति
सेना
बड़े व्यवसाय
में उच्च पद दिला सकता है।
राहु त्रिकोण या केंद्र में शुभ स्थिति में हो -:
यदि राहु-मंगल
केंद्र (1, 4, 7, 10)
या
त्रिकोण (1, 5, 9)
में हों और कुंडली में शुभ ग्रहों का समर्थन हो, तो
असाधारण महत्वाकांक्षा
बड़े जोखिम लेने की क्षमता
अचानक प्रसिद्धि और सत्ता
दे सकते हैं।
संक्षेप में -:
अंगारक दोष हमेशा अशुभ नहीं होता।
सही स्थिति में यह योग व्यक्ति को साहसी, प्रभावशाली और शक्तिशाली बना देता है।

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